आषाढ़ का पहला दिन

भवानीप्रसाद मिश्र

हवा का जोर वर्षा की झरी, झाड़ों का गिर पड़ना
कहीं गर्जन का जाकर दूर सिर के पास फिर पड़ना
उमड़ती नदी का खेती की छाती तक लहर उठना
ध्वजा की तरह बिजली का दिशाओं में फहर उठना

इस कविता में मानसून के शुरु होने पर एक किसान की खुशी का वर्णन किया गया है। आषाढ़ हिंदी कैलेंडर का एक महीना होता है और इस महीने के आसपास मानसून की शुरुआत होती है। जब मानसून आता है तो हवा जोरों से चलती है जिससे झाड़ झंखार गिर जाते हैं। बादल ऐसे गरजते हैं जैसे आपके सिर के ऊपर ही गर्जना कर रहे हों। नदियाँ अपने उफान पर होती हैं। कभी कभी तो वे खेत के कलेजे तक चढ़ जाती हैं। चारों दिशाओं में बिजली ऐसे चमकती है जैसे ध्वजाएं लहराती हों।

ये वर्षा के अनोखे दृश्य जिसको प्राण से प्यारे
जो चातक की तरह तकता है बादल घने कजरारे
जो भूखा रहकर, धरती चीरकर सबको खिलाता है
जो पानी वक्त पर आये नहीं तो तिलमिलाता है
अगर आषाढ़ के पहले दिवस के प्रथम इस क्षण में
वही हलधर अधिक आता है, कालिदास से मन में
तो मुझको क्षमा कर देना।

एक व्यक्ति जिसे वर्षा के ये अनूठे दृश्य प्राणों से भी प्यारे लगते हैं वो है किसान। किसान किसी पपीहे की तरह टकटकी लगाए बादलों का इंतजार करता है। वह खुद भूखा रहकर भी खेत में जी-तोड़ मेहनत करता है। उसकी मेहनत की बदौलत खेतों से अनाज निकलता है और दुनिया के लोगों को भोजन मिलता है। यदि समय पर बारिश नहीं आती है तो किसान को सबसे ज्यादा बेचैनी होती है।

कवि ने लिखा है कि अगर आपके मन में बादल देखने के बाद कालिदास की बजाय किसान की तस्वीर आती है तो उस समय एक ही रास्ता है और वो है कालिदास से क्षमा मांग लेना।

कालिदास रचित मेघदूतम एक प्रसिद्ध रचना है। इसमें प्रेमी और प्रेमिका मेघों के द्वारा अपना संदेश भेजते हैं। दोनों को हमेशा बादलों के आने का इंतजार रहता है। इस रचना की प्रसिद्धि के कारण साहित्य में मेघों की चर्चा होने पर कालिदास का ध्यान आना स्वाभाविक है।



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