अरेबियन नाइट्स

सिंदबाद की पहली यात्रा

मछली वाला टापू

ट्रांसलेशन: अजय आनंद

सिंदबाद के अब्बा एक अमीर व्यापारी थे। सिंदबाद के बचपन में ही उसके अब्बा का इंतकाल हो गया। जब सिंदबाद जवान हुआ तो विरासत में मिली दौलत से अय्याशी करने लगा। जल्दी ही अय्याशी करने के कारण उसका सबकुछ तबाह हो गया और वह सड़क पर आ गया।

इससे सिंदबाद के होश ठिकाने आ गये और वह कुछ काम धंधा करने के बारे में सोचने लगा। उसके पास जो कुछ भी बचा खुचा था उसे बेच दिया और उन पैसों से व्यापार करने के लिए निकल पड़ा।

वह फिर बसरा जाने वाले एक जहाज पर सवार हो गया जिस पर ढ़ेर सारे व्यापारी जा रहे थे। उनका जहाज कई शहरों से होते हुए गुजरा और फिर एक सुंदर टापू पर रुक गया। उस टापू पर वे लोग कुछ दिन आराम करना चाहते थे।

बाद में पता चला कि वह कोई टापू न होकर एक विशाल मछली थी जो ठंड के कारण कई वर्षों से जम गई थी। उसे वहाँ सोए सोए इतने बरस बीत चुके थे कि उसके ऊपर मिट्टी जम गई थी और पेड़ पौधे उग आए थे।

जब सिंदबाद और उसके साथियों ने वहाँ खाना पकाने के लिए आग जलाई तो उसकी गरमी पाकर वह विशाल मछली जाग चुकी थी। यह देखकर सब लोग अपनी अपनी जान बचाकर भागने लगे। कुछ लोग जहाज पर चढ़ने में कामयाब हुए और बाकी लोग पीछे छूट गए। सिंदबाद उन बदकिस्मत लोगों में था जो अब डूब रहे थे।

सिंदबाद की किस्मत ने साथ दिया और उसे लकड़ी की एक बड़ी सी नाद मिल गई जिसमें वह सवार हो गया। फिर लहरों और हवाओं ने उसे उसकी नाद के साथ बहाकर किसी टापू पर पटक दिया।

उस टापू पर मौजूद तरह तरह के रसीले फलों को खाकर कुछ ही दिनों में सिंदबाद भला चंगा हो गया। उसके बाद वह वहाँ से निकलने का रास्ता ढ़ूँढ़ने लगा। एक दिन उसे राजा मेहराज के आदमी मिले जो अपनी घोड़ियों की शादियाँ कराने उस टापू पर लेकर आए थे।

उन लोगों की मदद से सिंदबाद राजा मेहराज के नगर पहुँचा। जब राजा ने उसकी दुखभरी कहानी सुनी तो उसे नौकरी पर रख लिया। उसे बंदरगाह पर आने वाले जहाजों का लेखा जोखा रखने का काम सौंपा गया। बदले में अच्छी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ भी मिलीं।

वहाँ काम करते करते कई बरस बीत गए। वह उस बंदरगाह पर आने वाले हर जहाज में पूछताछ करता ताकि कोई उसे उसके मुल्क बगदाद वापस ले जाए। कई बरस बीतने के बाद एक जहाज के कप्तान से कुछ उम्मीद बंधी।

कप्तान के पास एक व्यापारी के कुछ सामान प‌ड़े थे जो किसी टापू पर डूब गया था। कप्तान से और पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि वह सामान और किसी का नहीं बल्कि सिंदबाद का था। इस तरह सिंदबाद को अपने वतन वापस जाने का मौका मिल गया। वह राजा मेहराज के पास गया, उसका शुक्रिया अदा किया और उससे अपने वतन वापस लौटने की अनुमति माँगी। फिर सिंदबाद उस जहाज पर सवार होकर अपने वतन लौट गया। उसके बाद वह अपने परिवार के साथ ऐशो आराम की जिंदगी बसर करने लगा।


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