कृतिका & संचयन

शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’

एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!

हमारी आजादी की लड़ाई में समाज के उपेक्षित माने जाने वाले वर्ग का योगदान भी कम नहीं रहा है। इस कहानी में ऐसे लोगों के योगदान को लेखक ने किस प्रकार उभारा है?

उत्तर: हमारी आजादी की लड़ाई में समाज के उपेक्षित माने जाने वाले वर्ग का योगदान भी कम नहीं रहा है। ये बात अलग है कि ऐसे लोगों के योगदान के बारे में हमें कम ही पढ़ने को मिलता है। इस कहानी में लेखक ने ऐसे लोगों के योगदान को बहुत भलीभाँति उभारा है। इस कहानी के मुख्य पात्र वह काम करते हैं जिसका लोग आनंद तो लेते हैं पर ऐसे काम करने वालों को हिकारत की दृष्टि से देखते हैं। लेखक को भलीभाँति पता है कि ऐसे लोगों की कहानी में बहुत कम लोगों की दिलचस्पी होगी। इसलिए लेखक ने इसे एक प्रेमकथा की शक्ल दे दी है ताकि लोगों की रुचि बनी रहे। दुलारी द्वारा नए और महँगे वस्त्र को आंदोलन के लिए समर्पित करना बहुत अहम है क्योंकि अन्य लोग तो अपने फटे पुराने कपड़े ही सौंप रहे थे। दुलारी के उस कृत्य से पता चलता है कि उसके अंदर भी देशप्रेम कूट-कूट कर भरा था। जुलूस में टुन्नू का शामिल होना और उस दिन उसकी खद्दड़ वाली वेशभूषा से पता चलता है कि वह भी स्वाधीनता संग्राम में अपने तरीके से योगदान करना चाहता था। ऐसा अक्सर होता है कि किसी भी बड़ी लड़ाई में लोग सिपाहियों के योगदान को भूल जाते हैं और केवल सेनापति को याद रखते हैं। लेखक ने इस स्थिति की पुनरावृत्ति अपनी कहानी में की है। बेचारा टुन्नू गुमनामी की मौत मारा जाता है जिसकी मौत पर आँसू बहाने के लिए केवल दुलारी बची हुई है।


कठोर हृदयी समझी जाने वाली दुलारी टुन्नू की मृत्यु पर क्यों विचलित हो उठी?

उत्तर: दुलारी मन ही मन में टुन्नू से प्यार करने लगती है। ये अलग बात है कि अबतक उसने टुन्नू के सामने अपना रौद्र रूप ही दिखाया था। जिस प्यार की अभी शुरुआत भी ठीक से नहीं हुई थी उसका नायक इस तरह अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है; यह बात दुलारी के मन पर गहरी चोट पहुँचाती है। इसलिए टुन्नू की मौत पर दुलारी विचलित हो उठी।

कजली दंगल जैसी गतिविधियों का आयोजन क्यों हुआ करता होगा? कुछ और परंपरागत लोक आयोजनों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: कजली दंगल जैसी गतिविधियाँ मनोरंजन के लिए आयोजित की जाती थीं। उस जमाने में फिल्में यदा कदा ही बनती थीं और बड़े शहरों के लोगों को ही नसीब हुआ करती थीं। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में नाच गाने, नाटक आदि से ही लोगों को मन बहलाना पड़ता था। नौटंकी, लवनी, पंडवानी, आदि कुछ ऐसे ही परंपरागत लोक आयोजन हैं।

दुलारी विशिष्ट कहे जाने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे से बाहर है फिर भी अति विशिष्ट है।
इस कथन को ध्यान में रखते हुए दुलारी की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर: दुलारी समाज के उस हासिए का हिस्सा है जिसे लोग अक्सर नजरांदाज करना ही पसंद करते हैं। फिर भी दुलारी विशिष्ट है। दुलारी अन्य नाचने-गाने वाली की तरह कहीं से भी कमजोर नहीं है। उसकी कठोर आँखें ये बताती है कि कोई भी गिद्ध-दृष्टि वाला मर्द उसे दबा नहीं सकता है। उसे लड़कों की तरह कसरत करना और अपनी भुजदंडें निहारना पसंद है। उसे इस समाज के शक्तिशाली लोगों से डर नहीं लगता है और ऐसे लोगों के बीच भी वह अपने मन की कहना और करना जानती है।


दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय कहाँ और किस रूप में हुआ?

उत्तर: दुलारी और टुन्नू की मुलाकात किसी जलसे में हुई थी जहाँ दोनों अलग-अलग स्थानों से कजली दंगल के लिए आए थे। उस कार्यक्रम में दुलारी जैसी प्रचंड गायिका को टक्कर देने वाला टुन्नू मिला। टुन्नू की गायकी और आत्मविश्वास से दुलारी पूरी तरह से प्रभावित हुई थी। उधर टुन्नू भी दुलारी के अनोखे व्यवहार से प्रभावित हुआ था।

दुलारी का टून्नू को यह कहना कहाँ तक उचित था, “तैं सरबउला बोल जिन्नगी में कब देखले लोट? ….!” दुलारी के इस आपेक्ष में आज के युवा वर्ग के लिए क्या संदेश छिपा है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस कटाक्ष में दुलारी का कहना है कि टुन्नू एक साधारण परिवार से आता है इसलिए उसके द्वारा नोटों की बात करना बेमानी है। इस तरह की बातें गायन के द्वारा नोकझोंक का एक अहम हिस्सा होती हैं। लेकिन इस तरह के कटाक्ष में भी संदेश छिपा होता है। आजकल के युवा अपने माता पिता कि आर्थिक स्थिति को समझने की कोशिश नहीं करते हैं और कई बार उनसे ऐसी चीजें दिलाने कि जिद करते हैं जिसमें उनके माता पिता असमर्थ हों। आप को कई ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाएँगे जिसमें एक किशोरवय लड़के या लड़की के पास महँगा स्मार्टफोन होगा लेकिन उसके माता-पिता के पास सस्ते वाला मोबाइल फोन मिलेगा। युवाओं को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने माँ बाप पर भार न बनें बल्कि उनका सहारा बनें।

भारत के स्वाधीनता आंदोलन में दुलारी और टुन्नू ने अपना योगदान किस प्रकार दिया?

उत्तर: दुलारी और टुन्नू ने अपने अपने तरीके से स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान दिया। दुलारी ने वस्त्रों की होली जलाने के लिए अपनी महँगी सारी दे दी। टुन्नू उस जुलूस में अपनी भागीदारी दिखा रहा था।


दुलारी और टुन्नू के प्रेम के पीछे उनका कलाकार मन और उनकी कला थी? यह प्रेम दुलारी को देश प्रेम तक कैसे पहुँचाता है?

उत्तर: जब सुबह टुन्नू दुलारी के लिए धोती लेकर आता है तब वह रेशमी कपड़ों की जगह खादी के कपड़े पहने होता है। यह बात दुलारी के मन में शायद घर कर जाती है। उसी से प्रेरित होकर वह अपनी महँगी सारी वस्त्रों की होली के लिए समर्पित कर देती है। बाद में टुन्नू की मौत के बाद जब वह गाने जाती है तो टुन्नू का दिया हुआ खादी का वस्त्र पहनी है। यह सब दिखाता है कि टुन्नू के प्रति दुलारी के प्रेम ने उसे देश प्रेम तक पहुँचा दिया।

जलाए जाने वाले विदेशी वस्त्रों के ढ़ेर में अधिकांश वस्त्र फटे-पुराने थे परंतु दुलारी द्वारा विदेशी मिलों में बनी कोरी साड़ियों का फेंका जाना उसकी किस मानसिकता को दर्शाता है?

उत्तर: दुलारी समाज के उस वर्ग से आती थी जिसे लोग तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। दुलारी के लिए वस्त्रों की होली में अपना योगदान देना एक सुनहरे मौके की तरह था जिससे वह भी इस समाज में अपनी भागीदारी साबित कर सके। इसी भावना से प्रेरित होकर उसने विदेशी मिलों में बनी कोरी सारी को फेंक दिया होगा।

“मन पर किसी का बस नहीं; वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।“ टुन्नू के इस कथन में उसका दुलारी के प्रति किशोर जनित प्रेम व्यक्त हुआ है परंतु उसके विवेक ने उसके प्रेम को किस दिशा की ओर मोड़ा?

उत्तर: टुन्नू का प्रेम असल मायने में किसी किशोर के प्रेम की तरह ही है, क्योंकि दुलारी ने कभी भी उसके प्रेम को स्वीकृति नहीं दी। फिर उसके विवेक ने उसे ललकारा होगा कि कोई सार्थक काम करके दुलारी के हृदय में जगह बनाई जाए। इसलिए वह स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने चला जाता है।

‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ का प्रतीकार्थ समझाइए।

उत्तर: यह गाना हिंदी फिल्म के मशहूर गाने ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ की तरह है। इस गाने में नायिका अपने प्रिय आभूषण के खोने की बात करती है और लोगों से पूछती है कि शायद कोई उसका पता बता दे। इस गाने में झुलनी को उसके मरे हुए प्रेमी का प्रतीक बनाया गया है जो हमेशा के लिए खो गया है।