कक्षा १० हिंदी क्षितिज

महावीर प्रसाद द्विवेदी

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री शिक्षा का समर्थन किया?

उत्तर: द्विवेदी जी ने पुराने जमाने के ऐसे कितने उदाहरण दिए हैं जिनमें पढ़ी लिखी स्त्रियों का उल्लेख हुआ है। इन उदाहरणों की मदद से वे इस कुतर्क को झुठलाना चाहते हैं कि पुराने जमाने में स्त्रियों को पढ़ाने की परंपरा नहीं थी। वे ये भी बताते हैं कि शायद पुराने जमाने में स्त्रियों को विधिवत शिक्षा देने की जरूरत नहीं पड़ी होगी। लेकिन जब हम जरूरत के हिसाब से हर पद्धति को बदल सकते हैं तो स्त्री शिक्षा के बारे में भी हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है।

‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’ – कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: दिववेदी जी नए बताया है कि पुरुषों ने स्त्रियों की तुलना में कहीं ज्यादा अनर्थ किए हैं। पुरुषों ने युद्ध में मार काट मचाई है, चोरी की है, डाका डाला है और अन्य कई अपराध किए हैं। इसलिए शिक्षा को अनर्थ के लिए दोष देना उचित नहीं है।


द्विवेदी जी ने स्त्री शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है – जैसे ;यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं।‘ आप ऐसे अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिखिए।

उत्तर: ‘सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने का ही नतीजा है।‘ – इस व्यंग्य में उन्होंने उस मानसिकता पर प्रहार किया है जो हर गलत घटना के लिए स्त्रियों की शिक्षा को जिम्मेदार ठहराता है। ‘स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट।‘ – इस पंक्ति के द्वारा द्विवेदी जी स्त्री शिक्षा के विरोधियों की दोहरी मानसिकता के बारे में बता रहे हैं।

पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है – पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: पुराने जमाने में कई ग्रंथ प्राकृत में लिखे गये थे। उदाहरण के लिए बुद्ध के उपदेशों को प्राकृत में लिखा गया था। शाक्यमुनि अपने उपदेश प्राकृत में ही देते थे। इससे यह पता चलता है कि प्राकृत भाषा उस समय अत्यधिक लोगों द्वारा बोली जाती थी। इसके अलावा हमें एक खास भाषा पर महारत को शिक्षा के मुद्दे से अलग करके देखना होगा। आधुनिक भारत में अंग्रेजी बोलने में पारंगत लोगों को अधिक संभ्रांत समझा जाता है। इसका ये मतलब नहीं है कि जो व्यक्ति अंग्रेजी बोलना नहीं जानता उसे हम अशिक्षित करार दे दें।


परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री पुरुष समानता को बढ़ाते हों – तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: परंपराएँ कभी-कभी रूढ़ि बन जाती हैं। जब ऐसी स्थिति हो जाए तो किसी खास परंपरा को तोड़ना ही सबके हित में होता है। समय बदलने के साथ पुरानी परंपराएँ टूटती हैं और नई परंपराओं का निर्माण होता है। इसलिए परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार करना चाहिए जो स्त्री पुरुष समानता को बढ़ाते हैं।

तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।

उत्तर: अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत में शिक्षा की कोई नियमबद्ध प्रणाली नहीं थी। वेदों और पुराणों के जमाने में ऋषि मुनि गुरुकुलों में शिक्षा दिया करते थे। ऐसे गुरुकुलों में छात्रों को गृहस्थ जीवन के लिए हर जरूरी क्रियाकलाप में दक्षता हासिल करनी होती थी। इसके अलावा उन्हें एक अच्छे योद्धा बनने का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। आज की शिक्षा प्रणाली अधिक परिष्कृत और नियमबद्ध है। आज नाना प्रकार के विषयों के ज्ञान दिए जाते हैं। पहले स्त्रियों की शिक्षा के लिए कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं थी लेकिन अब ऐसी बात नहीं है।


महावीर प्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?

उत्तर: महावीर प्रसाद द्विवेदी जिस जमाने के हैं उससे यह साफ पता चलता है कि उनकी सोच कितनी आधुनिक थी। उस जमाने में अधिकाँश लोग स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ थे। ऐसे में कोई स्त्री-पुरुष समानता की बात करे तो इसे दुस्साहस ही कहेंगे। महावीर प्रसाद का खुलापन इसी बात में झलता है।

द्विवेदी जी की भाषा शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तर: महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने भाषा को और शुद्ध तथा परिष्कृत किया। लेकिन उनकी भाषा पाठकों के लिए दुरूह न हो जाए इसका भी ध्यान दिया। उन्होंने अपनी भाषा में सरलता भी लाने की कोशिश की थी। इसके अलावा व्यंग्य का उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया है। व्यंग्य के इस्तेमाल से दो फायदे होते हैं। लेखक इससे पाठक को बाँधने में कामयाब हो जाता है। व्यंग्य के माध्यम से गंभीर से गंभीर बात भी आसानी से कही जा सकती है।