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मैथिलीशरण गुप्त

मनुष्यता (अभ्यास)

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

कवि ने कैसी मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है?

उत्तर: जो मनुष्य दूसरों के लिए अच्छे काम कर जाता है उस मनुष्य को मरने के बाद भी लोग याद रखते हैं। कवि ने ऐसी मृत्यु को ही सुमृत्यु कहा है।

उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उत्तर: जो आदमी पूरे संसार में अत्मीयता और भाईचारा का संचार करता है उसी व्यक्ति को उदार माना जा सकता है।


कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?

उत्तर: कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर मनुष्यता के लिए एक अहम संदेश दिया है। वे परोपकार का संदेश देना चाहते हैं। दूसरे का भला करने में चाहे अपना नुकसान ही क्यों न हो, लेकिन हमेशा दूसरे का भला करना चाहिए।

कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

उत्तर: कवि ने निम्न पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए।
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।

‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इन शब्दओं से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सभी मनुष्य हमारे भाई बंधु हैं। कवि के अनुसार इस बात की समझ एक बहुत बड़ा विवेक है।

कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?

उत्तर: मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य का जीवन आपसी सहकारिता पर निर्भर करता है। इसलिए कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा दी है।

व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।

उत्तर: किसी भी व्यक्ति को केवल अपने लिए जीने की कोशिश नहीं करना चाहिए। मनुष्य को दूसरों के लिए जीना चाहिए । इसी में सबका भला है।

'मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?

उत्तर: इस कविता के माध्यम से कवि आपसी भाईचारे का संदेश देना चाहते हैं।


निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए:

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ण क्या न सामने झुका रहा?

उत्तर: पूरी दुनिया पर उपकार करने की इक्षा ही सबसे बड़ा धन होता है। ईश्वर भी ऐसे लोगों के वश में हो जाते हैं। जब भगवान बुद्ध से लोगों का दर्द नहीं सहा गया तो वे दुनिया के नियमों के खिलाफ हो गए। उनका दुनिया के विरुद्ध जाना लोगों की भलाई के लिए था, इसलिए आज भी लोग उन्हें पूजते हैं।

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।

उत्तर: यहाँ पर कोई भी अनाथ नहीं है। भगवान के हाथ इतने बड़े हैं कि उनका हाथ सबके सिर पर होता है। इसलिए यह सोचकर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए कि तुम्हारे पास बहुत संपत्ति या यश है। ऐसा अधीर व्यक्ति बहुत बड़ा भाग्यहीन होता है।


चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढ़केलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

उत्तर: हमें अपने लक्ष्य की ओर हँसते हुए और रास्ते की बाधाओं को हटाते हुए चलते रहना चाहिए। जो रास्ता आपने चुना है उसपर बिना किसी बहस के पूरी निष्ठा से चलना चाहिए। इसमें भेदभाव बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, बल्कि भाईचारा जितना बढ़े उतना ही अच्छा है।



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