जाति, धर्म और लैंगिक मसले

श्रम का लैंगिक विभाजन

लैंगिक आधार पर श्रम का विभाजन एक ऐसा कड़वा सच है जो हमारे घरों और समाज में आज भी दिखाई देता है। अधिकांश घरों में चूल्हा-चौका और साफ सफाई के काम महिलाओं द्वारा या उनकी देखरेख में नौकरों द्वारा किये जाते हैं। घर के बाहर के काम पुरुषों द्वारा किये जाते हैं। सार्वजनिक जीवन पर अक्सर पुरुषों का वर्चस्व रहता है। महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर ही सिमट कर रहना पड़ता है।

नारीवादी आंदोलन: जो आंदोलन महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से किये जाते हैं उन्हें नारीवादी आंदोलन कहते हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में लैंगिक मसलों को लेकर राजनैतिक गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। इससे सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। भारत का समाज एक पितृ प्रधान समाज है। फिर भी आज महिलाएँ कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं।


अभी भी महिलाओं को कई तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ता है। इसके कुछ उदाहरण नीचे दिये गये हैं:

विश्व राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

Fig: विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की संसदों में महिलाएँ

महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व


धर्म और राजनीति:

धर्म हमारे राजनैतिक और सामाजिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। कुछ देशों में राजनीति पर केवल बहुसंख्यक समाज की पकड़ है। इससे अल्पसंख्यक समुदाय को भारी नुकसान होता है। यह बहुसंख्यक आतंक को बढ़ावा देता है।

सांप्रदायिकता: जब राजनैतिक वर्ग द्वारा एक धर्म को दूसरे धर्म से लड़वाया जाता है तो इसे सांप्रदायिकता या सांप्रदायिक राजनीति कहते हैं।

राजनीति में सांप्रदायिकता के कई रूप हो सकते हैं:

कुछ लोगों को लगता है कि उनका धर्म अन्य धर्मों की तुलना में श्रेयस्कर है। ऐसे लोग दूसरे धर्म के लोगों पर अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश करते हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में असुरक्षा की भावना भर जाती है।

अक्सर संप्रदाय के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश की जाती है। अल्पसंख्यक समुदाय में भय का माहौल भरने के लिये धार्मिक चिह्नों, धर्मगुरुओं और भावनात्मक अपीलों का इस्तेमाल होता है। कई बार सांप्रदायिकता इतना उग्र रूप ले लेती है कि सांप्रदायिक दंगे हो जाते हैं।

भारत की जनसंख्या में विभिन्न धर्म

Fig: भारत की जनसंख्या में विभिन्न धर्म (REF: census India)

धर्मनिरपेक्ष शासन


जाति और राजनीति

जाति व्यवस्था भारत के समाज की अनोखी विशेषता है। इस तरह की सामाजिक व्यवस्था किसी अन्य देश में नहीं पाई जाती है। जाति व्यवस्था के अनुसार हर जाति का एक तय पेशा होता है। किसी विशेष पेशे को किसी विशेष जाति में जन्म लेने वाला व्यक्ति ही अपना सकता है। किसी भी जाति के लोगों में अपनी जाति विशेष के प्रति गहरा लगाव देखने को मिलता है। इनमें से कुछ जातियों को ऊँची जाति माना जाता है जबकि अन्य जातियों को नीची जाति की श्रेणी में रखा जाता है।

जाति पर आधारित पूर्वाग्रह:

राजनीति में जाति

जातिगत असामनता

अभी भी जाति के आधार पर आर्थिक विषमता देखने को मिलती है। उँची जाति के लोग सामन्यतया संपन्न होते है। पिछड़ी जाति के लोग बीच में आते हैं, और दलित तथा आदिवासी सबसे नीचे आते हैं। सबसे निम्न जातियों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है। नीचे दिये गये टेबल से यह बात साफ हो जाती है।

गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों की जनसंख्या का प्रतिशत
जातिग्रामीणशहरी
अनुसूचित जनजाति45.8%35.6%
अनुसूचित जाति35.9%38.3%
अन्य पिछड़ी जातियाँ27%29.3%
मुस्लिम अगली जातियाँ26.8%34.2%
हिंदू अगली जातियाँ11.7%9.9%
ईसाई अगली जातियाँ9.6%5.4%
सिख अगली जातियाँ0%4.9%
अन्य अगली जातियाँ16%2.7%

REF: NSSO 55th round 1999 - 2000



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