क्लास 10 राजनीति शास्त्र

जन संघर्ष और आंदोलन

लामबंदी और संगठन

राजनैतिक पार्टियाँ: कुछ संगठन राजनैतिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से भागीदारी करते हैं। ऐसे संगठनों को राजनैतिक पार्टी कहते हैं। ऐसे संगठन चुनाव लड़ते हैं ताकि सरकार बना सकें।

दबाव समूह: कुछ संगठन राजनैतिक प्रक्रिया में परोक्ष रूप से भागीदारी करते हैं। ऐसे संगठनों को दबाव समूह कहते हैं।

दबाव समूह और आंदोलन:

दबाव समूहों का लक्ष्य सरकार बनाना या सरकार चलाना नहीं होता है। जब समान पेशे, रुचि, महात्वाकांछा या मतों वाले लोग किसी समान लक्ष्य की प्राप्ति के लिये एक मंच पर आते हैं तो वे दबाव समूह का निर्माण करते हैं। ऐसे समूह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये आंदोलन करते हैं। ऐसा जरूरी नहीं कि हर दबाव समूह कोई जन आंदोलन शुरु कर दे, बल्कि उनमें से कई तो केवल अपने छोटे से समूह में ही काम करते रहते हैं।

जन आंदोलन के कुछ उदाहरण हैं: नर्मदा बचाओ आंदोलन, सूचना के अधिकार के लिये आंदोलन, शराबबंदी के लिये आंदोलन, नारी आंदोलन, पर्यावरण आंदोलन।


वर्ग विशेष के हित समूह और जन सामान्य के हित समूह

वर्ग विशेष के हित समूह: ऐसे हित समूह समाज के किसी खास वर्ग या समूह के हितों के लिये काम करते हैं। ट्रेड यूनियन, बिजनेस एसोसियेशन, प्रोफेशनल (वकील, डॉक्टर, शिक्षक, आदि) के एसोसियेशन इसके उदाहरण हैं। ये किसी खास वर्ग की ही वकालत करते हैं; जैसे मजदूर, कामगार, व्यवसायी, उद्योगपति, किसी धर्म के अनुयायी, जाति समूह, आदि। अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करना और उनके हितों को बढ़ावा देना ही इस तरह के समूहों का मुख्य उद्देश्य होता है।

जन सामान्य के हित समूह: ऐसे समूह सर्व सामान्य के हितों की रक्षा करते हैं। ये एक बड़े जन समुदाय के हितों की बात करते हैं। इनका उद्देश्य पूरे समाज के हितों की रक्षा करना होता है न कि केवल अपने सदस्यों की। इस प्रकार के हित समूह के उदाहरण हैं: ट्रेड यूनियन, स्टूडेंट यूनियन, एक्स आर्मीमेन एसोसियेशन, आदि।


राजनीति पर दबाव समूह और आंदोलन का प्रभाव:

जन समर्थन: ऐसे समूह और आंदोलन अपने लक्ष्य और क्रियाकलापों के लिये जनता का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं। इसके लिये ये जागरूकता अभियान चलाते हैं, सभा करते हैं, पेटीशन फाइल करते हैं, आदि। इनमें से कई अपनी ओर जनता का ध्यान खींचने के लिये मीडिया को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

प्रदर्शन: ऐसे समूह अक्सर पदर्शन करते हैं। प्रदर्शन के दौरान ये हड़ताल करते हैं और सरकार के काम में बाधा उत्पन्न करते हैं। हड़ताल और बंद के द्वारा ये सरकार पर द्बाव बनाते हैं ताकि उनकी मांगों की सुध ली जाये।

लॉबी करना: बिजनेस ग्रुप तो अक्सर प्रोफेशनल लॉबिस्ट की सेवा लेते हैं और महंगे इश्तहार भी चलाते हैं। दबाव समूह और आंदोलन में से कुछ लोग आधिकारिक निकायों और कमिटियों में भी भाग लेते हैं ताकि सरकार को सलाह दे सकें। एसोचैम और नैसकॉम इस तरह के समूह के उदाहरण हैं।

राजनैतिक पार्टियों पर प्रभाव: हित समूह और आंदोलन राजनैतिक पार्टियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। किसी भी मुख्य मुद्दे पर उनका एक खास राजनैतिक मत और सिद्धांत होता है। एक दबाव समूह किसी राजनैतिक पार्टी से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा भी हो सकता है।

भारत के अधिकांश ट्रेड यूनियन और स्टूडेंट यूनियन किसी न किसी मुख्य पार्टी से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। इस तरह के समूहों के कार्यकर्ता सामान्यतया किसी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता होते हैं।


कई बार किसी आंदोलन से राजनैतिक पार्टी का भी जन्म होता है। असम गण परिषद इसका एक अच्छा उदाहरण है। इस पार्टी का जन्म असम में बाहरी लोगों के खिलाफ चलने वाले छात्र आंदोलन से हुआ था। तामिलनाडु की दो मुख्य राजनैतिक पार्टियों (डीएमके और एआईडीएमके) का जन्म 1930 और 1940 के दशक में चलने वाले सामाजिक सुधार आंदोलन से हुआ था। अभी हाल में बनी आम आदमी पार्टी का जन्म सूचना के अधिकार के आंदोलन से हुआ है।

लेकिन ज्यादातर मामलों में किसी राजनैतिक पार्टी और दबाव समूह की बीच का रिश्ता उतना प्रत्यक्ष नहीं होता है। वे अक्सर एक दूसरे के विरोधाभाषी रवैये को अपनाते हैं। लेकिन इसके बावजूद वे बातचीत का रास्ता भी अपनाते रहते हैं। दबाव समूहों द्वारा उठाये जाने वाले अधिकतर मुद्दों को राजनैतिक पार्टियाँ भी आगे बढ़ाती रहती हैं। कई राजनैतिक पार्टियों के कई नये नेता किसी दबाव समूह या आंदोलन से निकलकर आते हैं।

दबाव समूह के प्रभाव का मूल्यांकन

दबाव समूहों के खिलाफ कई तर्क दिये जाते हैं। कई विचारकों का मानना है कि चूँकि दबाव समूह समाज के एक छोटे से वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिये इनको सुनते हुए सावधानी बरतनी चाहिए। लोकतंत्र किसी छोटे से वर्ग के संकीर्ण हितों के लिये नहीं काम करता बल्कि पूरे समाज के हितों के लिये काम करता है। राजनैतिक पार्टियों के विपरीत किसी दबाव समूह को जनता को जवाब नहीं देना होता है इसलिये उनकी सोच का दायरा बड़ा नहीं हो सकता। कई बार तो ऐसे दबाव समूहों को बिजनेस की लॉबी करने वाले या अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ भी हवा देती रहती हैं। इसलिये इनकी बात सुनने से पहले पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।

कई लोग दबाव समूह का समर्थन करते हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र की जड़ें जमाने के लिये सरकार पर दबाव डालना हमेशा जायज होता है। इनका मानना है कि राजनैतिक सत्ता हथियाने के चक्कर में राजनैतिक पार्टियाँ अक्सर जनता के असली मुद्दों की अवहेलना करती हैं। दबाव समूह उनको उनकी नींद से जगाने का काम करते हैं।

ऐसा कहा जा सकता है कि दबाव समूह विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं में संतुलन का काम करते हैं और सामान्यतया लोगों की असली समस्याओं को उजागर करते हैं।