राष्ट्रीय पार्टी

भारत में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक स्वतंत्र संस्था है जिसे चुनाव आयोग कहते हैं। हर राजनीतिक दल को चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है। चुनाव आयोग हर पार्टी को समान नजर से देखता है। लेकिन बड़ी और स्थापित पार्टियों को कुछ विशेष सुविधाएँ दी जाती हैं। ऐसी पार्टियों को मान्यताप्राप्त पार्टी कहते हैं। किसी भी मान्यताप्राप्त पार्टी को अलग चुनाव चिह्न दिया जाता है। उस चुनाव चिह्न का इस्तेमाल उस पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार ही कर सकता है।

  1. राज्य स्तर की पार्टी: जिस पार्टी को विधान सभा के चुनाव में कुल वोट के कम से कम 6% वोट मिलते हैं और जो कम से कम दो सीटों पर चुनाव जीतती है उसे राज्य स्तर की पार्टी कहते हैं।
  2. राष्ट्रीय स्तर की पार्टी: जिस पार्टी को लोक सभा चुनावों में या चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कम से कम 6% वोट मिलते हैं और जो लोकसभा में कम से कम चार सीट जीतती है उसे राष्ट्रीय स्तर की पार्टी कहते हैं।

इस वर्गीकरण के अनुसार 2006 में देश में छ: राष्ट्रीय पार्टियाँ थीं। इनका वर्णन नीचे दिया गया है।

  1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: इसे कांग्रेस पार्टी के नाम से भी जाना जाता है। यह सौ वर्षों से भी पुरानी पार्टी है जिसकी स्थापना 1885 में हुई थी। भारत की आजादी की लड़ाई में इस पार्टी की मुख्य भूमिका रही है। भारत की आजादी के बाद के कई दशकों तक कांग्रेस पार्टी ने भारतीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई है। आजादी के बाद के सत्तर वर्षों में पचास से अधिक वर्षों तक केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही है।
  2. भारतीय जनता पार्टी: इस पार्टी की स्थापना 1980 में हुई थी। इस पार्टी को भारतीय जन संघ के पुनर्जन्म के रूप में माना जा सकता है। इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य है एक शक्तिशाली और आधुनिक भारत का निर्माण। भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व पर आधारित राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहती है। यह धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना चाहती है और एक यूनिफॉर्म सिविल कोड लाना चाहती है। 1990 के दशक में इस पार्टी का जनाधार तेजी से बढ़ा। यह पार्टी पहली बार 1998 में सत्ता में आई और 2004 तक शासन किया। उसके बाद यह पार्टी 2014 में सत्ता में आई है।
  3. बहुजन समाज पार्टी: इस पार्टी की स्थापना कांसी राम के नेतृत्व में 1984 में हुई थी। यह पार्टी बहुजन समाज के लिये सत्ता चाहती है। बहुजन समाज में दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग आते हैं। इस पार्टी की पकड़ उत्तर प्रदेश में बहुत अच्छी है और यह उत्तर प्रदेश में दो बार सरकार भी बना चुकी है।
  4. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी – मार्क्सवादी: इस पार्टी की स्थापना 1964 में हुई थी। इस पार्टी की मुख्य विचारधारा मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों पर आधारित है। यह पार्टी समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करती है। इस पार्टी को पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में अच्छा समर्थन प्राप्त है; खासकर से गरीबों, मिल मजदूरों, किसानों, कृषक श्रमिकों और बुद्धिजीवियों के बीच्। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस पार्टी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई है और पश्चिम बंगाल की सत्ता इसके हाथ से निकल गई है।
  5. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी: इस पार्टी की स्थापना 1925 में हुई थी। इसकी नीतियाँ सीपीआई (एम) से मिलती जुलती हैं। 1964 में पार्टी के विभाजन के बाद यह कमजोर हो गई। इस पार्टी को केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब, आंध्र प्रदेश और तामिलनाडु में ठीक ठाक समर्थन प्राप्त है। लेकिन इसका जनाधार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से खिसका है। 2004 के लोक सभा चुनाव में इस पार्टी को 1.4% वोट मिले और 10 सीटें मिली थीं। शुरु में इस पार्टी ने यूपीए सरकार का बाहर से समर्थन किया था लेकिन 2008 के आखिर में इसने समर्थन वापस ले लिया।
  6. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी: कांग्रेस पार्टी में फूट के परिणामस्वरूप 1999 में इस पार्टी का जन्म हुआ था। यह पार्टी लोकतंत्र, गांधीवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता, सामाजिक न्याय और संघीय ढ़ाँचे की वकालत करती है। यह पार्टी महाराष्ट्र में काफी शक्तिशाली है और इसको मेघालय, मणिपुर और असम में भी समर्थन प्राप्त है।

क्षेत्रीय पार्टियों का उदय: पिछले तीन दशकों में कई क्षेत्रीय पार्टियों का महत्व बढ़ा है। इससे भारत में लोकतंत्र के फैलाव और उसकी गहरी होती जड़ों का पता चलता है। कुछ क्षेत्रीय नेता अपने अपने राज्यों में काफी शक्तिशाली हैं। समाजवादी पार्टी, बीजू जनता दल, एआईडीएमके, डीएमके, आदि क्षेत्रीय पार्टी के उदाहरण हैं।


राजनीतिक दलों के लिये चुनौतियाँ:

आंतरिक लोकतंत्र का अभाव: अधिकतर पार्टी का नियंत्रण कुछ गिनेचुने लोगों के हाथों में रहता है। पार्टी का साधारण सदस्य शायद ही ऊँचे पदों पर पहुँच पाता है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अक्सर जमीनी कार्यकर्ताओं से कटा रहता है। इसलिए कार्यकर्ताओं की स्वामिभक्ति पार्टी से होने की बजाय शीर्ष नेतृत्व से होता है।

वंशवाद: वंशवाद की समस्या अधिकतर पार्टियों में है। इन पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व एक ही परिवार के सदस्य संभालते हैं। पार्टी का उत्तराधिकार जन्म के आधार पर तय होता है और इस तरह से लोकतंत्र अर्थहीन हो जाता है। यह समस्या केवल भारत में ही नहीं बल्कि कई अन्य देशों में भी है।

पैसा और अपराधी तत्वों का प्रभाव: चुनाव जीतना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए राजनीतिक दल हर प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं। चुनाव के दौरान पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। आपराधिक तत्वों का इस्तेमाल करके मतदाताओं और चुनाव अधिकारियों को डराया-धमकाया भी जाता है।

विकल्पहीनता: ज्यादातर पार्टियाँ एक जैसी नीतियाँ अपनाती हैं। इसलिए लोगों को सही विकल्प नहीं मिल पाता है। कई राज्यों में हर पाँच साल पर सत्ताधारी पार्टी बदल जाती है लेकिन लोगों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आ पाता है।


राजनीतिक दलों को सुधारने के उपाय:

हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों और नेताओं में सुधार लाने के लिये कुछ उपाय नीचे दिये गये हैं:

दलबदल कानून: भारत की राजनीति में एक दौर आया था जब दलबदलू नेताओं के कारण कुछ राज्यों में पाँच साल में कई सरकारें बदल जाती थीं। राजीव गांधी की सरकार ने इसे रोकने के लिये दलबदल कानून पास कराया था। इससे दलबदल को कम करने में काफी मदद मिली और राजनीतिक स्थिरता भी बहाल हो पाई। लेकिन इस कानून के कारण पार्टी में विरोध का स्वर उठाना मुश्किल हो गया है।

नामांकण के समय संपत्ति और क्रिमिनल केस का ब्यौरा देना: नये नियमों के अनुसार चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को नामांकण के समय एक शपथ पत्र पर अपनी संपत्ति और अपने ऊपर चल रहे केस मुकदमों का ब्यौरा देना पड़ता है। इससे जनता को उम्मीदवार के बारे में अधिक जानकारी मिलने लगी है। लेकिन उम्मीदवार सही सूचना दे रहा है या नहीं यह जाँचने के लिए अभी तक कोई सिस्टम नहीं है।

अनिवार्य संगठन चुनाव और टैक्स रिटर्न: चुनाव आयोग ने अब पार्टियों के लिये संगठन चुनाव और टैक्स रिटर्न को अनिवार्य कर दिया है। राजनीतिक पार्टियों ने इसे शुरु कर दिया है लेकिन अभी यह महज औपचारिकता के तौर पर होता है।

भविष्य के लिये सलाह:



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