भूमंडलीकृत विश्व

आज अधिकतर लोग शायद यह सोचते होंगे कि वैश्वीकरण एक नई परिघटना है। लेकिन वैश्वीकरण सदियों से चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है। प्राचीन काल से ही व्यापारी और अन्य लोग एक स्थान से दूसरे स्थान आते जाते रहे हैं। व्यापार से न केवल माल का बल्कि विचारों, संस्कृति, आविष्कारों और यहाँ तक कि बिमारियों का भी आदान प्रदान हुआ है। इस सतत चलने वाले आदान प्रदान ने दुनिया के विभिन्न देशों को आपस में जोड़ने का काम किया है। सिंधु घाटी की सभ्यता के युग में भी विभिन्न देशों के बीच व्यावसायिक संपर्क था। यह बात और है कि आधुनिक युग में यह संपर्क तेजी से बढ़ा है।


सिल्क रूट

भोजन की यात्रा

व्यापार के कारण एक देश का भोजन दूसरे देश तक पहुँचा है। इसको समझने के लिये नूडल का उदाहरण लेते हैं। यह चीन की देन है जो आज पूरी दुनिया में विभिन्न रूपों में इस्तेमाल होता है। भारत में यह सेवियों के रूप में इस्तेमाल होता है तो इटली में स्पैघेट्टी के रूप में।

आज आलू, टमाटर, मिर्च, सोया, मक्का, मूंगफली और शकरकंद पूरी दुनिया में आम खाद्य पदार्थ की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं। आलू और टमाटर भारत में लगभग हर सब्जी बनाने में इस्तेमाल होते हैं। ये पदार्थ यूरोप में तब आये जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिकी महाद्वीपों को खोजा था।

आलू ने यूरोप के आम लोगों का जीवन आमूल रूप से बदल दिया। जो लोग पहले भुखमरी के शिकार हो जाते थे उन्हें आलू के रूप में एक बेहतर भोजन मिला। आलू के महत्व का पता इस बात से चलता है कि जब 1840 के दशक में आयरलैंड में किसी बीमारी से आलू की फसल तबाह हो गई तो कई लाख लोग भूख से मर गये। उस अकाल को आइरिस अकाल के नाम से जाना जाता है।


बीमारी, व्यापार और फतह

सोलहवीं सदी में यूरोप के नाविकों ने एशिया और अमेरिका के देशों के लिए समुद्री मार्ग खोज लिया था। इस खोज ने न केवल व्यापार को फैलाने में मदद की बल्कि विश्व के अन्य भागों में यूरोप की फतह की नींव भी रखी। अमेरिका के विशाल भूभाग के अनाजों और खनिजों ने दुनिया के अन्य भाग के लोगों का जीवन पूरी तरह से बदल कर रख दिया।

सोलहवीं सदी के मध्य तक पुर्तगाल और स्पेन द्वारा अमेरिकी उपनिवेशों की अहम शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन यूरोपियन की यह जीत किसी हथियार के कारण नहीं बल्कि एक बीमारी के कारण संभव हो पाई थी। यूरोप के लोग पहले ही चेचक की बीमारी से पीड़ित हो चुके थे। इसलिए यूरोपीय लोगों के शरीर में चेचक से लड़ने के लिए प्रतिरोधन क्षमता विकसित हो चुकी थी। लेकिन दुनिया के अन्य भागों से अलग थलग होने के कारण अमेरिकी लोगों के शरीर में चेचक से लड़ने की प्रतिरोधन क्षमता नहीं थी। यूरोपीय लोग अपने साथ चेचक के जीवाणु भी अमेरिका ले गये। इससे अमेरिकी लोगों में चेचक की बीमारी फैलने लगी जिसके कारण अमेरिका के कुछ हिस्सों की पूरी आबादी साफ हो गई। इससे यूरोपीय लोगों को आसानी से अमेरिका पर जीत मिल गई।

यूरोप में उन्नीसवीं सदी तक कई समस्याएँ थीं; जैसे गरीबी, बीमारी और धार्मिक टकराव। धर्म के खिलाफ बोलने वाले कई लोगों को सजा का डर था इसलिए वे अमेरिका भाग जाते थे। उन्होंने अमेरिका में नये सिरे से जीवन शुरु किया और काफी तरक्की की।

अठारहवीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे धनी देश हुआ करते थे। लेकिन चीन ने पंद्रहवीं सदी से ही बाहरी संपर्क पर अंकुश लगाना शुरु किया था। इस तरह से चीन दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग थलग हो गया था। चीन के घटते प्रभाव और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व के व्यापार का केंद्रबिंदु यूरोप की तरफ शिफ्ट कर रहा था।

उन्नीसवीं शताब्दी (1815 – 1914)

उन्नीसवीं सदी में विश्व तेजी से बदल रहा था। इस अवधि में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में बड़े जटिल बदलाव हुए जिनके कारण विभिन्न देशों के रिश्तों के समीकरण में अभूतपूर्व बदलाव आए। अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक आदान प्रदान तीन प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं:

  1. व्यापार का आदान प्रदान
  2. श्रम का आदान प्रदान
  3. पूँजी का आदान प्रदान

वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण

यूरोप में भोजन के उत्पादन और उपभोग का बदलता स्वरूप: अक्सर भोजन के मामले में हर देश आत्मनिर्भर होना चाहता है। लेकिन यूरोप के लिये आत्मनिर्भर होने का अर्थ था लोगों के लिये घटिया क्वालिटी का भोजन मिलना।

अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण भोजन की माँग में भी तेजी से वृद्धि हुई। सरकार को जमींदारों के दबाव के कारण मक्के के आयात पर नियंत्रण लगाना पड़ा। मक्के के आयात पर नियंत्रण वाले कानून को कॉर्न लॉ कहा जाता था। इसके कारण ब्रिटेन में भोजन की कीमतें बढ़ गईं। उसके बाद उद्योगपतियों और शहरी लोगों के दबाव के कारण वहाँ की सरकार ने कॉर्न लॉ को समाप्त कर दिया।

कॉर्न लॉ हटने के प्रभाव:

कॉर्न लॉ के समाप्त होने से ब्रिटेन में बाहर से सस्ता अनाज आयात होने लगा। ब्रिटेन में उपजाया जाने वाला अनाज महंगा होने के कारण आयात के आगे टिक नहीं पाया।

खेती में नुकसान होने से किसानों ने खेती की जमीन का एक बड़ा हिस्सा खाली छोड़ दिया। लोग भारी संख्या में बेरोजगार हो गये और गांवों से भारी संख्या में लोग शहरों की ओर पलायन करने लगे। कई लोग तो रोजगार की तलाश में विदेशों की तरफ भी पलायन कर गये।

दाम गिरने से ब्रिटेन में खाने पीने की चीजों की माँग बढ़ने लगी। औद्योगीकरण ने लोगों की आमदनी भी बढ़ा दी थी। इसलिये ब्रिटेन में अतिरिक्त भोजन आयात की मांग बढ़ने लगी। इस मांग को पूरा करने के लिये पूर्वी यूरोप, अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया में जमीन के एक बड़े हिस्से को खेती के लिए साफ किया जाने लगा।

अनाज को खेतों से बंदरगाहों तक सही समय पर पहुँचाने के लिये रेल लाइनें बिछाई गईं और खेतों को बंदरगाहों से जोड़ा गया। खेतों पर काम करने के लिये आसपास नई आबादी बसाने की जरूरत भी महसूस हुई। इन जरूरतों को पूरा करने के लिये लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से इन स्थानों तक पूँजी भी आने लगी।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मजदूरों की किल्लत हो रही थी। काम की तलाश में भारी संख्या में लोग वहाँ पहुँचने लगे। इस अवधि में पूरी दुनिया के विभिन्न भागों से लगभग 15 करोड़ लोगों का पलायन हुआ था। इस तरह से 1890 के दशक के आते-आते कृषि क्षेत्र में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो चुका था। इसी के साथ श्रम और पूँजी के प्रवाह तथा तकनीकी बदलाव के क्षेत्र में बड़े ही जटिल परिवर्तन हुए।


तकनीक की भूमिका

इस दौरान विश्व की अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में टेकनॉलोजी ने एक अहम भूमिका निभाई। इस युग के कुछ मुख्य तकनीकी खोज हैं रेलवे, स्टीम शिप और टेलिग्राफ।

मीट का व्यापार: नई टेक्नॉलोजी से आम आदमी का जीवन किस तरह बेहतर होता है इसका एक अच्छा उदाहरण मीट के व्यापार में देखने को मिलता है। मीट का व्यापार इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण है कि नई टेक्नॉलोजी से किस तरह आम आदमी का जीवन बेहतर हो जाता है। 1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप तक जानवरों को जिंदा ही ले जाया जाता था। जिंदा जानवरों को जहाज से ले जाने का मतलब था कई मुसीबतें। जिंदा जानवरों के लिए अधिक जगह की जरूरत पड़ती थी। रास्ते में कई जानवर बीमार हो जाते थे या मर भी जाते थे। इसलिए यूरोप के ज्यादातर लोगों के लिए मीट एक विलासिता की वस्तु ही थी। रेफ्रिजरेशन टेक्नॉलोजी से तस्वीर बदल गई। रेफ्रिजरेशन टेक्नॉलोजी के आने से जिंदा जानवरों के स्थान पर प्रोसेस्ड मीट ले जाना संभव हो पाया। अब जहाज में उपलब्ध जगह का इस्तेमाल बेहतर होने लगा और अधिक मीट यूरोप पहुँचने लगा। यूरोप में मीट के दाम गिर गये और अधिक से अधिक लोग नियमित रूप से मीट खाने लगे। जब लोगों का पेट भरा होता है तो देश में सामाजिक शांति रहती है। इसलिए अब ब्रिटेन के लोग अपने देश की उपनिवेशी महात्वाकाँछा को गले उतारने को तैयार लगने लगे।



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