क्लास 10 इतिहास

यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

राष्ट्रवाद: किसी भी राष्ट्र के सदस्यों में एक साझा पहचान को बढ़ावा देने वाली विचारधारा को राष्ट्रवाद कहा जाता है। राष्ट्रवाद की भावना को जड़ जमाने में राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रगान, आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय: उन्नीसवीं सदी के मध्य के पहले यूरोपीय देश उस रूप में नहीं थे जिस रूप में उन्हें हम आज जानते हैं। यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों पर विभिन्न प्रकार के वंशानुगत साम्राज्यों का राज हुआ करता था। ये सभी राजतांत्रिक शासक थे जिन्हें अपनी प्रजा पर पूरा नियंत्रण हुआ करता था। उस काल में तकनीकी में कई ऐसे बदलाव हुए जिनके कारण समाज में आए बदलाव ने राष्ट्रवाद की भावना को जन्म दिया। सन 1789 में शुरु होने वाली फ्रांस की क्रांति के साथ ही नए राष्ट्रों के निर्माण की प्रक्रिया भी शुरु हो गई थी। लेकिन इस नई विचारधारा को जड़ जमाने में लगभग सौ साल लग गए। इसकी परिणति के रूप में फ्रांस का एक प्रजातांत्रिक देश के रुप में गठन हुआ। यही सिलसिला यूरोप के अन्य भागों में भी चलने लगा और बीसवीं सदी के शुरुआत आते आते विश्व के कई भागों में आधुनिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई।

फ्रांसीसी क्रांति

राष्ट्रवाद की पहली अभिव्यक्ति: फ्रांसीसी क्रांति के कारण फ्रांस की राजनीति और संविधान में कई बदलाव आए। सन 1789 में सत्ता का स्थानांतरण राजतंत्र से एक ऐसी संस्था को हुआ जिसका गठन नागरिकों द्वारा हुआ था। उसके बाद ऐसा माना जाने लगा कि फ्रांस के लोग ही आगे से अपने देश का भविष्य तय करेंगे।


राष्ट्र की भावना की रचना:

क्रांतिकारियों लोगों में एक साझा पहचान की भावना स्थापित करने के लिए कई कदम उठाए। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • एक पितृभूमि और उसके नागरिकों की भावना का प्रचार जिससे एक ऐसे समाज की अवधारणा को बल मिले जिसमें लोगों को संविधान से समान अधिकार प्राप्त थे।
  • राजसी प्रतीक को हटाकर एक नए फ्रांसीसी झंडे का इस्तेमाल किया गया जो कि तिरंगा था।
  • इस्टेट जेनरल को सक्रिय नागरिकों द्वारा चुना गया और उसका नाम बदलकर नेशनल एसेंबली कर दिया गया।
  • राष्ट्र के नाम पर नए स्तुति गीत बनाए गए और शपथ लिए गए।
  • शहीदों को नमन किया गया।
  • एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था बनाई गई जिसने सभी नागरिकों के लिए एक जैसे नियम बनाए।
  • फ्रांस के भूभाग में प्रचलित कस्टम ड्यूटी को समाप्त किया गया।
  • भार और मापन की एक मानक पद्धति अपनाई गई।
  • क्षेत्रीय भाषाओं को नेपथ्य में धकेला गया और फ्रेंच भाषा को राष्ट्र की आम भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया।
  • क्रांतिकारियों ने ये भी घोषणा की कि यूरोप के अन्य भागों से तानाशाही समाप्त करना और वहाँ राष्ट्र की स्थापना करना भी फ्रांस के लोगों का मिशन होगा।

यूरोप के अन्य भागों पर प्रभाव:

फ्रांस में होने वाली गतिविधियों से यूरोप के कई शहरों के लोग पूरी तरह प्रभावित थे और जोश में आ चुके थे। इसके परिणामस्वरूप, शिक्षित मध्यवर्ग के लोगों और छात्रों द्वारा जैकोबिन क्लब बनाए जाने लगे। उनकी गतिविधियों ने फ्रांस की सेना द्वारा अतिक्रमण का रास्ता साफ कर दिया। 1790 के दशक में फ्रांस की सेना ने हॉलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैड और इटली के एक बड़े भूभाग में घुसपैठ कर ली थी। इस तरह से फ्रांस की सेना ने अन्य देशों में राष्ट्रवाद का प्रचार करने का काम शुरु किया।


नेपोलियन

नेपोलियन 1804 से 1815 के बीच फ्रांस का बादशाह था। नेपोलियन ने फ्रांस में प्रजातंत्र को तहस नहस कर दिया और वहाँ फिर से राजतंत्र की स्थापना कर दी। लेकिन उसने प्रशासन के क्षेत्र में कई क्रांतिकारी बदलाव किए। उसने उस व्यवस्था को बेहतर और कुशल बनाने की कोशिश की। 1804 का सिविल कोड; जिसे नेपोलियन कोड भी कहा जाता है; ने जन्म के आधार पर मिलने वाले हर सुविधाओं को समाप्त कर दिया। इसने कानून में सबको समान हैसियत प्रदान की और संपत्ति के अधिकार को पुख्ता किया। जैसा कि उसने फ्रांस में किया था; अपने नियंत्रण वाले हर इलाकों में उसने नए नए सुधार किए। उसने डच रिपब्लिक, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी में प्रशासनिक विभागों को सरल कर दिया। उसने सामंती व्यवस्था को समाप्त कर दिया और किसानों को दासता और जागीर को अदा होने वाले शुल्कों से मुक्त कर दिया। शहरों में प्रचलित शिल्प मंडलियों द्वारा लगाई गई सीमितताओं को भी समाप्त किया गया। यातायात और संचार के साधनों में सुधार किए गए।


जनता की प्रतिक्रिया:

इस नई आजादी का किसानों, कारीगरों और कामगारों ने जमकर स्वागत किया। उन्हें समझ आ गया था कि एक समान कानून और मानक मापन पद्धति और एक साझा मुद्रा से देश के विभिन्न क्षेत्रों में सामान और मुद्रा के आदान प्रदान में बड़ी सहूलियत मिलने वाली थी।

लेकिन जिन इलाकों पर फ्रांस ने कब्जा जमाया था, वहाँ के लोगों की फ्रांसीसी शासन के बारे में मिली जुली प्रतिक्रिया थी। शुरु में तो फ्रांस की सेना को आजादी के दूत के रूप में देखा गया। लेकिन जल्दी ही लोगों की समझ में आ गया कि इस नई शासन व्यवस्था से राजनैतिक स्वतंत्रता की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। नेपोलियन द्वारा लाए गए प्रशासनिक बदलावों की तुलना में टैक्स में भारी बढ़ोतरी और फ्रांस की सेना में जबरदस्ती भर्ती अधिक भारी लगने लगे। इस तरह से शुरुआती जोश जल्दी ही विरोध में बदलने लगा।