यूरोप में राष्ट्रवाद

क्रांति के पहले की स्थिति

अठारहवीं सदी के मध्यकाल में यूरोप में वैसे राष्ट्र नहीं हुआ करते थे जैसा हम आज जानते और समझते हैं। आज के जर्मनी, इटली और स्विट्जरलैंड कई सूबों, प्रांतों और साम्राज्यों में विभाजित थे। हर हिस्से का शासक अपने आप में स्वतंत्र हुआ करता था। पूर्वी और मध्य यूरोप में कई शक्तिशाली राजा थे जिनके अधीन अलग अलग तरह के लोग रहा करते थे, जिनकी कोई साझा पहचान नहीं होती थी। उनमें केवल एक ही समानता थी तो वह थी किसी एक खास शासक के प्रति समर्पण।


राष्ट्रों के उदय के कारण और प्रक्रिया

अभिजात वर्ग

यूरोपीय महाद्वीप में हमेशा से ही सामाजिक और राजनैतिक तौर पर जमीन से संपन्न कुलीन वर्ग प्रभावशाली हुआ करता था। क्षेत्रीय विविधता के बावजूद कुलीन वर्ग के लोगों की जीवन शैली एक जैसी होती थी। यह जीवन शैली उन्हें एक सूत्र में पिरोये रखती थी। उनकी जागीरें गांवों में होती थीं, लेकिन उनके आलीशान भवन शहरों में होते थे। शादियों के बंधन के द्वारा वे आपस में संबंध बनाये रखते थे। अपनी एक खास पहचान बनाये रखने और कूटनीतिक संबंध बनाये रखने के उद्देश्य से वे फ्रेंच भाषा बोलते थे।

यह अभिजात वर्ग संख्याबल में छोटा था लेकिन सत्ता से संपन्न था। आबादी का अधिकांश हिस्सा किसानों से भरा हुआ था। पश्चिमी यूरोप में अधिकतर जमीन पर काश्तकार और छोटे किसान खेती करते थे। पूर्वी और केंद्रीय यूरोप में बड़ी-बड़ी जागीरें होती थीं जहाँ काम करने के लिये दासों को रखा जाता था।

मध्यम वर्ग का उदय

पश्चिमी और केंद्रीय यूरोप के कुछ भागों में उद्योग धंधे फलने फूलने लगे। इसके परिणामस्वरूप शहरों का विकास हुआ और उन शहरों में एक नये सामाजिक वर्ग का उदय हुआ। उस नये वर्ग का जन्म बाजार के लिये उत्पादन की मंशा से हुआ था, लेकिन इससे समाज में नये समूहों और वर्गों का जन्म हुआ। इस नये समूह में एक वर्ग मजदूरों का था और दूसरा मध्यम वर्ग का। उद्योगपति, व्यापारी और व्यवसायी उस मध्यम वर्ग के मुख्य भाग थे। इसी मध्यम वर्ग के माध्यम से राष्ट्रीय एकता की भावना को रूप मिलने लगा।


उदार राष्ट्रवाद की भावना

उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर में यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना और उदारवाद की भावना में गहरा तालमेल था। नये मध्यम वर्ग के लिये उदारवाद की जड़ में व्यक्ति की स्वतंत्रता और समान अधिकार की भावनाएँ थीं। यदि राजनैतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो उदारवाद की भावना ने ही आम सहमति से शासन के सिद्धांत को बल दिया होगा। उदारवाद की भावना ने तानाशाही और वंशानुगत विशेषाधिकारों का अंत किया होगा। इससे एक संविधान की आवश्यकता महसूस होने लगी, और प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार की आवश्यकता भी महसूस होने लगी। इसी काल में उदारवादियों द्वारा संपत्ति की अक्षुण्णता की बात पक्के तौर रखी जाने लगी।

मताधिकार

मताधिकार के लिये फ्रांस के लोगों को लंबा संघर्ष करना पड़ा था। मत देने का अधिकार हर नागरिक को नहीं मिला था। क्रांति के शुरुआती दौर में केवल उन पुरुषों को मताधिकार मिला था जिनके पास संपत्ति होती थी। हर वयस्क पुरुष को जैकोबिन क्लबों के दौर में थोड़े समय के लिये मताधिकार मिला था। लेकिन नेपोलियन कोड ने फिर से पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी थी। महिलाओं और संपत्तिविहीन पुरुषों को मताधिकार से वंचित रखा गया था। नेपोलियन ने तो महिलाओं को नाबालिग के समान दर्जा दे रखा था। पूरी उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के शुरु तक इन लोगों को मताधिकार के लिये संघर्ष करना पड़ा।

आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण

नेपोलियन कोड की एक और खास बात थी आर्थिक उदारीकरण। उस समय हाल ही में पनपने वाला मध्यम वर्ग आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में था। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में आधुनिक जर्मनी वाले भूभाग में 39 प्रांत थे जो कई छोटी-छोटी इकाइयों में बँटे हुए थे। हर इकाई की अलग मुद्रा और मापतौल की अलग प्रणाली थी। किसी व्यापारी को एक भाग से दूसरे भाग तक माल ले जाने के लिए दस ग्यारह चुंगी नाकाओं से गुजरना पड़ता था और हर नाके पर लगभग 5% चुंगी देनी होती थी। अलग-अलग मापतौल प्रणाली के कारण चुंगी की राशि तय करने में बड़ी उलझन होती थी। इससे आर्थिक गतिविधियों में खलल पड़ता था।

प्रसिया की पहल पर 1834 में जोवरलिन के कस्टम यूनियन का गठन हुआ। समय बीतने के साथ जर्मनी के राज्य भी इस यूनियन में शामिल हो गये। चुंगी की सीमाओं को हटा दिया गया और मुद्राओं के प्रकार तीस से घटकर दो हो गये। इसी दौरान रेल नेटवर्क का विकास होने से आवगमन सरल हो गया। इसके परिणामस्वरूप एक तरह के आर्थिक राष्ट्रवाद का विकास हुआ जिसने उस समय पनप रही राष्ट्रवाद की भावना को बल दिया।


1815 के बाद एक नए रुढ़िवाद का जन्म

सन 1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रसिया और ऑस्ट्रिया की सम्मिलित शक्तियों ने नेपोलियन को हरा दिया। नेपोलियन की हार के बाद, यूरोप की सरकारें रुढ़िवाद की ओर वापस लौटना चाहती थीं। रुढ़िवादियों का मानना था कि समाज और देश की परंपरागत संस्थाओं का संरक्षण आवश्यक था। वे चाहते थे कि राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ढ़ाँचे, संपत्ति और परिवार के पुराने ढ़ाँचे बरकरार रहें। लेकिन उनमें से अधिकांश लोग इस पक्ष में थे कि प्रशासन के क्षेत्र में नेपोलियन द्वारा लाये गये बदलाव जारी रहें। उन्हें लगता था कि प्रशासन में सुधार से परंपरागत संस्थाओं को और बल मिलेगा। उनका मानना था कि यूरोप के राजतंत्र को मजबूत बनाने के लिए एक कुशल प्रशासन, गतिशील अर्थव्यवस्था और सामंतवाद तथा दासता का अंत जरूरी था।

वियेना संधि

यूरोप की नई रूपरेखा तय करने के लिए सन 1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रसिया और ऑस्ट्रिया (जो यूरोपियन शक्ति के प्रतिनिधि थे) ने वियेना में एक मीटिंग की। ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मेटर्निक पर इस कांग्रेस की मेहमाननवाजी की जिम्मेदारी थी। इस मीटिंग में वियेना संधि का खाका तैयार किया गया, जिसका मुख्य लक्ष्य था नेपोलियन के काल में हुए अधिकाँश बदलावों को बदल देना। इस संधि के अनुसार कई कदम उठाए गए जिनमे से कुछ नीचे दिये गये हैं:


क्रांतिकारी

जियुसेपे मेत्सीनी एक इटालियन क्रांतिकारी था। उसका जन्म 1807 में हुआ था। वह कार्बोनारी के सीक्रेट सोसाइटी का सदस्य बन गया। केवल 24 साल की उम्र में उसे लिगुरिया में क्रांति फैलाने की कोशिश में 1831 में देशनिकाला दे दिया गया। उसके बाद उसने दो अन्य सीक्रेट सोसाइटी का गठन किया। इनमें से पहला था मार्सेय में यंग ईटली और फिर बर्ने में यंग यूरोप। मेत्सीनी का मानना था कि भगवान ने राष्ट्र को मानवता की नैसर्गिक इकाई बनाया है। इसलिए उसे लगता था कि इटली को छोटे छोटे राज्यों के बेमेल संगठन से बदलकर एक लोकतंत्र बनाने की आवश्यकता थी। मेत्सीनी का अनुसरण करते हुए लोगों ने जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और पोलैंड में ऐसी कई सीक्रेट सोसाइटी बनाई। रुढ़िवादियों के बीच मेत्सिनी का बड़ा खौफ था।

जब रुढ़िवादी ताकतें अपनी शक्ति को और मजबूत करने में लगी थीं, उदारवादी और राष्ट्रवादी शक्तियाँ क्रांति की भावना को अधिक से अधिक लोगों तक फैलाने की कोशिश कर रही थीं। इन लोगों में ज्यादातर मध्यम वर्ग के अभिजात लोग थे; जैसे कि प्रोफेसर, स्कूल टीचर, क्लर्क, और व्यवसायी।

फ्रांस में पहला उथल पुथल 1830 की जुलाई में हुआ। उदारवादी क्रांतिकारियों ने बोर्बोन के राजाओं को गद्दी से हटा दिया। उसके बाद एक संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई और लुई फिलिप को उसका मुखिया बनाया गया। जुलाई की उस क्रांति के बाद ब्रसेल्स में भी आक्रोश बढ़ने लगा जिसके परिणामस्वरूप नीदरलैंड के यूनाइटेड किंगडम से बेल्जियम अलग हो गया।



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