यूरोप में राष्ट्रवाद

ग्रीस की आजादी

ग्रीस की आजादी का संघर्ष 1821 में शुरु हुआ था। जिन लोगों को देशनिकाला दे दिया गया था उन्होंने ग्रीस के राष्ट्रवादियों को भारी समर्थन दिया। पश्चिमी यूरोप के लोग प्राचीन ग्रीक संस्कृति का सम्मान करते थे, इसलिए उन्होंने भी ग्रीस के राष्ट्रवादियों का समर्थन किया। कवियों और कलाकारों ने जन भावना को राष्ट्रवादियों के पक्ष में करने की भरपूर कोशिश की। यह याद रखना चाहिए कि ग्रीस उस समय ऑटोमन साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था। आखिरकार 1832 में कॉन्स्टैंटिनोपल की ट्रीटी हुई और ग्रीस को एक स्वतंत्र देश की मान्यता मिल गई। ग्रीस की आजादी की लड़ाई से पूरे यूरोप के पढ़े लिखे वर्ग में राष्ट्रवाद की भावना और मजबूत हुई।


राष्ट्रवादी भावना और रोमाँचक परिकल्पना

रोमांटिसिज्म एक सांस्कृतिक आंदोलन था जिसने राष्ट्रवादी भावना के एक खास स्वरूप को विकसित करने की कोशिश की थी। रोमांटिक कलाकार विज्ञान और तर्क को बढ़ावा देने की बजाय भावुकता, सहज ज्ञान और रहस्यों पर अधिक जोर देते थे। उन्होंने एक साझा विरासत और साझा सांस्कृतिक इतिहास को राष्ट्र के आधार के रूप में बनाने की कोशिश की थी।

कई अन्य रोमांटिक; जैसे कि जर्मनी के तर्कशास्त्री जोहान गॉटफ्रिड हर्डर (1744 – 1803); का मानना था कि जर्मन संस्कृति के सही स्वरूप को वहाँ के आम लोगों में ढ़ूँढ़ा जा सकता था। इन रोमांटिक विचारकों ने गीत, लोक कविता और लोक नृत्य की मदद से देश की सच्ची भावना को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। जब अधिकतर लोग निरक्षर हों तब आम लोगों की भाषा का इस्तेमाल अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। कैरोल करपिंस्की ने पोलैंड में अपने ओपेरा के माध्यम से राष्ट्रवाद के संघर्ष को और उजागर किया था। उन्होंने वहाँ के लोक नृत्यों (जैसे कि पोलोनैज और माजुर्का) को राष्ट्रीय प्रतीक में बदल दिया था।

राष्ट्रवादी भावना को बढ़ावा देने में भाषा का अहम योगदान था। रूस ने सत्ता हड़पने के बाद पोलैंड के स्कूलों से पॉलिश भाषा को हटा दिया और हर जगह रूसी भाषा को थोपने लगा। रूसी शासन के खिलाफ 1831 में एक हथियारबंद विद्रोह शुरु हुआ जिसे कुचल दिया गया। लेकिन इसके बाद पादरी वर्ग के सदस्यों ने राष्ट्रीय विरोध के शस्त्र के रुप में पॉलिश भाषा का इस्तेमाल करना शुरु किया। सभी धार्मिक गतिविधियों में पॉलिश भाषा के इस्तेमाल पर जोर दिया जाने लगा। इसके लिए कई पादरियों को जेल में डाल दिया गया, या साइबेरिया भेज दिया गया। इस तरह पॉलिश भाषा का इस्तेमाल रूसी प्रभुत्व के खिलाफ विरोध का प्रतीक बन गया।


भूखमरी, कठिनाइयाँ और लोगों का विरोध

1830 का दशक यूरोप के लिए आर्थिक तंगी का दशक था। उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। बेरोजगारों भी तेजी से बढ़ रही थी। लोग भारी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की तरफ पलायन कर रहे थे। ऐसे लोग शहरों में अत्यंत भीड़-भाड़ वाली झुग्गी झोपड़ियों में रहते थे।

उस दौरान यूरोप के अन्य भागों की तुलना में इंग्लैंड में अधिक तेजी से औद्योगिकीकरण हुआ था। इसलिए इंग्लैंड की मिलों में बनने वाले सस्ते सामानों ने यूरोप के अन्य देशों में छोटे उत्पादकों द्वारा बनाए जाने वाले सामानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दी। अभी भी यूरोप के कुछ क्षेत्रों में अभिजात वर्ग का नियंत्रण था, जिसके कारण किसानों पर सामंतों के लगान का भारी बोझ था। फसल के नुकसान और खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों के कारण कई गांवों और शहरों में भूखमरी की नौबत आ चुकी थी।

1848 में ऐसा ही हुआ था। भोजन की कमी और बढ़ती बेरोजगारी के कारण पेरिस के लोगों को सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ा। इतना जबरदस्त विद्रोह हुआ कि लुई फिलिप को वहाँ से भागना पड़ा। एक नेशनल एसेंबली ने प्रजातंत्र की घोषणा कर दी। 21 साल से अधिक उम्र के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार दे दिया गया। लोगों को काम के अधिकार की घोषणा की गई। रोजगार प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय कार्यशाला बनाई गई।


उदारवादियों की क्रांति

उन्नीसवीं सदी के मध्य में गरीबों द्वारा किये जा रहे विद्रोह के अलावा मध्यम वर्ग की अगुवाई में भी एक क्रांति शुरु हो चुकी थी। जर्मनी, इटली, पोलैंड और ऑस्ट्रो-हंगैरियन साम्राज्य में स्वाधीन राष्ट्र जैसी कोई धारना ही नहीं थी। इन क्षेत्रों में मध्यम वर्ग के लोगों द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण और संविधान की मांग शुरु हुई। वे लोग संसदीय प्रणाली पर आधारित राष्ट्र, संविधान, प्रेस की आजादी तथा गुटबंदी की आजादी की मांग कर रहे थे।

फ्रैंकफर्ट पार्लियामेंट: फ्रैंकफर्ट पार्लियामेंट का नाम राष्ट्रवाद के आंदोलन के एक मुख्य पड़ाव के रूप में गिना जाता है। जर्मनी में मध्यम वर्गीय लोगों के राजनैतिक संगठनों के सदस्यों ने मिलकर एक सकल जर्मन एसेंबली के लिये वोट किया और 18 मई 1848 को 831 चुने प्रतिनिधियों का जुलूस सेंट पॉल के चर्च में आयोजित फ्रैंकफर्ट पार्लियामेंट की ओर चल पड़े। उस पार्लियामेंट में एक जर्मन राष्ट्र का संविधान बनाया गया और उस संविधान के अनुसार प्रसिया के राजा फ्रेडरिक विल्हेम (चतुर्थ) को जर्मनी का शासन सौंपने की पेशकश की गई।

लेकिन फ्रेडरिक विल्हेम ने उस अनुरोध को ठुकराते हुए अन्य राजाओं से हाथ मिला लिया जो उस चुनी हुई संसद के विरोध में थे। पार्लियामेंट में केवल मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व होने के कारण उसका सामाजिक आधार कमजोर पड़ने लगा। अभिजात वर्ग और सेना के साथ-साथ मजदूर भी उस पार्लियामेंट के विरोध में आ गये। अंत में सेना के हस्तक्षेप से एसेंबली को समाप्त कर दिया गया।

उदारवादी आंदोलन में भारी संख्या में भाग लेने के बावजूद महिलाओं कभी भी बराबरी का दर्जा नहीं मिला। उस आंदोलन को कुचल दिये जाने के बाद भी पुरानी व्यवस्था फिर से बहाल नहीं हो पाई। उसके काफी अर्से बाद राजा को यह समझ में आने लगा कि आंदोलनकारियों की मांगों को मानना ही सही होगा। इसलिए मध्य और पूर्वी यूरोप के राजाओं ने उन बदलावों को अपना लिया जो पश्चिमी यूरोप में 1815 से पहले ही हो चुके थे।


जर्मनी: क्या सेना किसी राष्ट्र का निर्माण कर सकती है?

1848 के बाद राष्ट्रवाद की भावना को रुढ़िवादी ताकतों से बढ़ावा मिलने लगा। ऐसा करके रुढ़िवादी शक्तियाँ अपनी ताकत बढ़ाना चाहती थीं ताकि यूरोप में राजनैतिक प्रभुता मिल सके।

ओटो वॉन बिस्मार्क: प्रसिया के मुख्यमंत्री बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण की नींव रखी थी। उसने इस काम के लिए प्रसिया के सेना और प्रशासन की मदद ली। सात वर्षों में प्रसिया ने तीन लड़ाइयाँ लड़ी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के खिलाफ। युद्ध का अंत प्रसिया की जीत के साथ हुआ और इस तरह से जर्मनी का एकीकरण पूरा हुआ। 1871 की जनवरी में वार्सा में हुए एक समारोह में प्रसिया के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का बादशाह घोषित किया गया। इस नये राष्ट्र में मुद्रा, बैंकिंग और न्याय व्यवस्था के आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रसिया के कायदे कानून ही अधिकतर मामलों में जर्मनी के लिए मॉडल का काम करते थे।



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