9 हिंदी स्पर्श

गीत अगीत

रामधारी सिंह दिनकर

गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कहती जाती है।
तट पर एक गुलाब सोचता
“देते स्वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।“
गा गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?


कविता के इस भाग में नदी के बहने से जो दृश्य उत्पन्न होता है उसका मनोहारी वर्णन है। नदी विरह के गीत गाते हुए बड़ी तेजी से बह रही है। ऐसे में लगता है कि वह किनारों से कुछ कह रही है। पास में ही किनारे पर एक गुलाब चुपचाप यह सब देख रहा है और सोच रहा है कि यदि भगवान ने उसे भी बोलने की शक्ति दी होती तो वह भी पूरी दुनिया को अपने सपनों के गीत सुनाता।

बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो खोंते को छाया देती।
पंख फुला नीचे खोंते में
शुकी बैठ अंडे है सेती।
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर।
किंतु, शुकी के गीत उमड़कर
रह जाते सनेह में सनकर।
गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फूला मग्न शुकी का पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?


किसी डाल पर तोता बैठा हुआ है और उसी डाल की छाया में जो घोंसला है उसमें उसकी मादा अंडे से रही है। जब सूर्य की किरणें पत्तों से छनकर आती हैं और तोते के पंखों का स्पर्श करती हैं तो तोता गाने लगता है। उसका गाना सुनकर उसकी मादा भी गाना चाहती है लेकिन उसका गीत केवल प्यार में सराबोर होकर रह जाता है और उसके मुँह से कुछ नहीं निकलता है। उधर तोते का गीत पूरे वन में गूँज रहा है और इधर उसकी मादा फूले नहीं समा रही है।

दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्हा गाता है,
पहला स्वर उसकी राधा को
घर से यहीं खींच लाता है।


चोरी-चोरी छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है।
वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है।
गीत, अगीत कौन सुंदर है?

वन में दो प्रेमी रहते हैं। जब प्रेमी शाम के समय आल्हा गाता है तो उसकी प्रेमिका उस गाने को सुनने के लिए खिंची चली आती है। वह छुप छुप कर गाना सुनती है और सोचती है कि वह उस गीत का हिस्सा क्यों नहीं बन जाती है। जब प्रेमी गाता है तो प्रेमिका का मन फूले नहीं समाता है।