9 हिंदी स्पर्श

धूल

रामविलास शर्मा

NCERT Solution

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक दो पंक्तियों में दीजिए

Question 1: हीरे के प्रेमी उसे किस रूप में पसंद करते हैं?

उत्तर: हीरे के प्रेमी उसे वैसे रूप में पसंद करते हैं जब हीरा तराशा हुआ हो और चमकदार हो।

Question 2: लेखक ने संसार में किस प्रकार के सुख को दुर्लभ माना है?

उत्तर: लेखक ने किसी शिशु के धूल से सने चेहरे की सुंदरता निहारने के सुख को दुर्लभ माना है।

Question 3: मिट्टी की आभा क्या है? उसकी पहचान किससे होती है?

उत्तर: मिट्टी की आभा धूल है। मिट्टी की पहचान धूल से होती है।


निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 25 – 30 शब्दों में लिखिए:

Question 1: धूल के बिना किसी शिशु की कल्पना क्यों नहीं की जा सकती है?

उत्तर: हमारा शरीर जिन अवयवओं से बना है वे सभी मिट्टी से ही प्राप्त होते हैं। इसलिए मिट्टी के बिना किसी शिशु की कल्पना नहीं की जा सकती है।

Question 2: हमारी सभ्यता धूल से क्यों बचना चाहती है?

उत्तर: हमारी सभ्यता को लगता है की धूल मैलेपन की निशानी है। उसे लगता है कि धूल से बाहरी सुंदरता पर बट्टा लगता है। इसलिए हमारी सभ्यता धूल से बचना चाहती है।

Question 3: अखाड़े की मिट्टी की क्या विशेषता होती है?

उत्तर: अखाड़े की मिट्टी आम मिट्टी नहीं होती है। इसे बनाने के लिए इसमें तेल और मट्ठा मिलाया जाता है। उसके बाद ही उस मिट्टी की एक खास विशेषता बनती है।

Question 4: श्रद्धा, भक्ति, स्नेह की व्यंजना के लिए धूल सर्वोत्तम साधन किस प्रकार है?

उत्तर: हम अपनी श्रद्धा या भक्ति या स्नेह धूल से व्यक्त करते हैं। जैसे जब हम अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं तो उनकी चरण धूलि अपने माथे से लगाते हैं। जब कोई माता अपने बच्चे पर स्नेह दिखाती है तो वह उसके धूल से सने गाल को भी चूमती है। किसी योद्धा या खिलाड़ी या किसी बड़े राजनेता द्वारा जमीन को चूमकर उसके प्रति अपनी श्रद्धा दिखाना भी एक आम बात होती है। ऐसा करके हम यह दर्शाते हैं कि धूल का हमारे जीवन में क्या महत्व है।

Question 5: इस पाठ में लेखक ने नगरीय सभ्यता पर क्या व्यंग्य किया है?

उत्तर: इस पाठ में लेखक ने नगरीय सभ्यता की कृत्रिमता पर व्यंग्य किया है। लेखक ने कहा है कि शहरी लोग धूल से बचने के लिए तरह तरह के उपाय करते हैं क्योंकि वे धूल को मैल का पर्याय मानते हैं। वे ऊँचे मकानों में रहते हैं, काँच की दीवार बनाते हैं, मोटे परदे लगाते हैं, ताकि धूल से बच सकें।


Question 1: लेखक ‘बालकृष्ण’ के मुँह पर छाई गोधूलि को श्रेष्ठ क्यों मानता है?

उत्तर: लेखक के अनुसार जिसका बचपन गाँव में बीता हो उसे धूल के महत्व का मतलब मालूम होता है। धूल या मिट्टी से ही हर चीज बनती है; जैसे कि हमारा शरीर क्योंकि इसके सारे अवयव् मिट्टी से ही आते हैं। इसलिए कोई अपने चेहरे पर मेकअप के कितने भी साधन क्यों न लगा लें, किसी शिशु के मुख पर लगी धूल के आगे सभी बेकार हैं। इसलिए लेखक बालकृष्ण के मुँह पर छाई गोधूलि को श्रेष्ठ मानता है।

Question 2: लेखक ने धूल और मिट्टी में क्या अंतर बताया है?

उत्तर: लेखक का मानना है कि मिट्टी और धूल में वही अंतर है जो शब्द और रस में, देह और प्राण में, चाँद और चाँदनी में। बिना रस के हम शब्द की कल्पना नहीं कर सकते हैं। बिना प्राण के यह देह बेकार हो जाता है। बिना चाँदनी के चाँद की सुंदरता चली जाती है। उसी तरह बिना धूल के मिट्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

Question 3: ग्रामीण परिवेश में प्रकृति धूल के कौन-कौन से सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है?

उत्तर: ग्रामीण परिवेश में प्रकृति धूल के तरह तरह के चित्र प्रस्तुत करती है। जब पेड़ों के झुरमुट से छनकर सूर्य की किरण आती है तो उसमें मिली हुई धूल सोना बन जाती है। सूर्यास्त के बाद गाड़ियों के निकलने से पीछे बने धूल के गुबार का सौंदर्य देखते ही बनता है। चांदनी रात में जब गाड़ियों का काफिला चलता है तो उसके पीछे धूल के बादल गजब की छटा देते हैं। इस प्रकार का सौंदर्य शहर के माहौल में देखने को नहीं मिलता है।

Question 4: ‘हीरा वही घन चोट न टूटे’ – का संदर्भ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने धूल के पीछे छुपे हुए अटूट सत्य के बारे में कहा है। हो सकता है कि किसान के धूल धूसरित पैर हमें बेढ़ंगे दिखाई दें। लेकिन उसी किसान की मेहनत के कारण हमें भोजन नसीब होता है। सभ्यता चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, किसान के धूल भरे हाथ की सार्थकता हमेशा बनी रहेगी।

Question 5: धूल, धूलि, धूली, धूरि और गोधूलि की व्यंजनाओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: धूल, धूलि, धूली, धूरि, गोधूलि, आदि के अलग अलग मतलब हैं। धूल जीवन का यथार्थ है। धूलि जीवन की कविता है। धूली जीवन का छायावादी दर्शन है, जिसकी वास्तविकता संदिग्ध है। धूरि लोक-संस्कृति का नवीन जागरण है। गोधूलि गाँव की संपत्ति है जो शहर में दुर्लभ है। इन सबका रंग एक ही है; भले ही उनके रूप अलग-अलग हों। मिट्टी अलग-अलग रंगों की होती है लेकिन धूल का नाम आते ही उजले रंग का ध्यान आता है।

Question 6: ‘धूल’ पाठ का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पाठ में धूल के महत्व और उसकी सार्थकता को समझाया गया है। साथ में यह भी बताया गया है कि किस तरह से आधुनिक सभ्यता के पक्षधर धूल के अस्तित्व को नकारने की असफल कोशिश करते हैं। धूल के बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। धूल किसी हीरे की तरह ही अजर अमर है, जबकि कई लोग काँच की झूठी चमक के चक्कर में हीरे के अस्तित्व को नकार देते हैं।

Question 7: कविता को विडंबना मानते हुए लेखक ने क्या कहा है?

उत्तर: किसी प्रकाशक ने निमंत्रण में लोगों से गोधूलि वेला में आने का आग्रह किया था। शायद वह इस बात से अनभिज्ञ था कि धूल धक्कड़ से भरे शहर में गोधूलि का कोई अस्तित्व नहीं होता। गोधूलि तो गाँव की नैसर्गिक सुंदरता का एक अहम हिस्सा होती है। इसलिए निमंत्रण में लिखी पंक्ति को लेखक ने कविता की विडंबना कहा है।


निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:

Question 1: फूल के ऊपर जो रेणु उसका श्रृंगार बनती है, वही धूल शिशु के मुँह पर उसकी सहज पार्थिवता को निखार देती है।

उत्तर: इस पंक्ति में लेखक ने धूल की महत्ता का वर्णन किया है। जब धूलकण फूल की पंखुड़ियों के ऊपर पड़ते हैं तो अपनी चमक से फूल के सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं। वही धूल जब किसी शिशु के मुँह से लग जाती है तो शिशु की सुंदरता बढ़ जाती है।

Question 2: ‘धन्य-धन्य वे हैं नर मैले जो करत गात कनिया लगाय धूरि ऐसे लरिकान की’ – लेखक इन पंक्तियों द्वारा क्या कहना चाहता है?

उत्तर: इन पंक्तियों द्वारा लेखक उस व्यक्ति की मानसिकता को बता रहा है जिसने यह पंक्तियाँ लिखी है। धन्य-धन्य कहकर एक ओर तो वह अपना बड़प्पन दिखा रहा है लेकिन मैले कहकर वह अपनी मानसिक संकीर्णता दिखा रहा है। लरिकान शब्द का उपयोग करके कवि ने अभिजात और ग्रामीण लोगों के बीच भेदभाव को जाहिर किया है। यह वह आदमी है जिसे हीरों से तो प्यार है लेकिन धूल भरे हीरों से नहीं। ऐसे लोगों को काँच के गुलदस्ते में लगे कागज के फूल शायद अधिक मोहित कर पाते होंगे।

Question 3: मिट्टी और धूल में अंतर है, लेकिन उतना ही, जितना शब्द और रस में, देह और प्राण में, चाँद और चाँदनी में।

उत्तर: लेखक का मानना है कि मिट्टी और धूल में वही अंतर है जो शब्द और रस में, देह और प्राण में, चाँद और चाँदनी में। बिना रस के हम शब्द की कल्पना नहीं कर सकते हैं। बिना प्राण के यह देह बेकार हो जाता है। बिना चाँदनी के चाँद की सुंदरता चली जाती है। उसी तरह बिना धूल के मिट्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

Question 4: हमारी देशभक्ति धूल को माथे से न लगाए तो कम से कम उस पर पैर तो रखे।

उत्तर: मातृभूमि की मिट्टी अनमोल होती है। जरूरी नहीं कि आप इसके प्रति सम्मान दिखाने के लिए इसे माथे से लगाएँ। लेकिन यह जरूरी है कि आप उस मिट्टी पर अपने पैर जमाएँ रखें और हवा में न उड़ें।

Question 5: वे उलटकर चोट भी करेंगे और तब काँच और हीरे का भेद जानना बाकी न रहेगा।

उत्तर: हीरा सबसे कठोर पदार्थ माना जाता है इसलिए इसकी चिरायु जग जाहिर है। काँच चाहे कितना भी चमकीला क्यों न हो, वह क्षणभंगुर होता है। काँच को काटने के लिए हीरे का इस्तेमाल होता है लेकिन हीरे को हीरा ही काट सकता है। जब कठिन परीक्षा की घड़ी आती है तब असली हीरे की पहचान होती है।