कृतिका & संचयन

शिवपूजन सहाय

माता का अंचल

प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपदा के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। आपकी समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है?

उत्तर: यह सही है कि इस कहानी में बच्चों का अपने पिता के साथ अधिक जुड़ाव दिखाया गया है। लेकिन बच्चे अपने पिता और माता को अलग-अलग नजरिये से देखते हैं। जब उन्हें अत्यधिक असुरक्षा की भावना घेर लेती है तो वे अपनी माँ से सहारे और सांत्वना की उम्मीद करते हैं। पिता से बच्चे बाहरी दुनिया के बारे में सीखने को अधिक उत्सुक रहते हैं। माँ ममता और स्नेह की मूर्ति मानी जाती है। शायद इसलिए वह बच्चा विपदा के समय अपनी माँ की शरण में जाता है।

आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?

उत्तर: छोटे बच्चों में अक्सर ऐसा देखा जाता है। जब उनका कोई प्रिय खिलौना मिल जाता है तो वे तुरंत ही पिछला सब कुछ भूलकर अपने खेल में खो जाते हैं। अपने साथियों को देखकर भोलानाथ को जी भर कर खेलने का मौका मिल जाता था। इसलिए उन्हें देखकर भोलानाथ सिसकना भूल जाता था।


आपने देखा होगा कि भोलानाथ और उसके साथी जब-तब खेलते-खाते समय किसी न किसी प्रकार की तुकबंदी करते हैं। आपको यदि अपने खेलों आदि से जुड़ी तुकबंदी याद हो तो लिखिए।

उत्तर: पुराने जमाने के लोग; जैसे कि मेरे दादा-दादी और नाना-नानी अक्सर हमें ऐसी तुकबंदियों के बारे में बताते हैं। अब तो मुझे तुकबंदी के नाम पर कुछ फिल्मी गीत या फिर मोगली वाला गीत, “जंगल जंगल पता चला है, चड्ढ़ी पहन के फूल खिला है।“ है याद है।

भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: भोलानाथ और उसके साथी अपने आस पास उपलब्ध साधारण से साधारण चीज को भी खिलौना बना लेते थे। मैं या तो अपने स्मार्टफोन पर कोई गेम खेलता हूँ या फिर अपने स्कूल में क्रिकेट और फुटबॉल खेलता हूँ। कभी-कभी अपनी गली में मैं अन्य बच्चों के साथ पिट्ठू खेलता हूँ। लेकिन हमें भोलानाथ और उसके साथियों की तरह पूरे दिन खेलने की आजादी नहीं मिल पाती है।


पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों।

उत्तर: इस पाठ के लगभग सभी प्रसंग दिल को छूने वाले हैं। भोलानाथ द्वारा बाबूजी के कंधे की सवारी। उसकी मइया द्वारा उसे तोता मैना के कौर बनाकर खिलाना, उसकी अपने बाबूजी के साथ कुश्ती, साँप के डर से भागकर उसका अपनी माँ के आँचल में छुप जाना; ये सब कुछ विशेष प्रसंग हैं।

इस उपन्यास के अंश में तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति का चित्रण है। आज की ग्रामीण संस्कृति में आपको किस तरह के परिवर्तन दिखाई देते हैं?

उत्तर: तीस के दशक को बीते हुए 70 साल हो गए हैं। यह एक लंबा अरसा होता है इसलिए बहुत कुछ बड़े पैमाने पर बदल चुका है। अब गाँव के बच्चे स्कूल जाते हैं; कुछ अत्यंत गरीब बच्चों को छोड़कर। हर गाँव में टीवी आ जाने के कारण अधिकतर बच्चे टीवी देखने में मशगूल रहते हैं। क्रिकेट गाँव गाँव में काफी लोकप्रिय है। कई घरों के बच्चे तो मोबाइल फोन पर उपलब्ध गेम का भी आनंद उठाते हैं। अब रामनामी लिखने वाले बाबूजी भी शायद ही मिलें।

यहाँ माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: इस कहानी में लेखक ने माता-पिता के वात्सल्य का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है। पिता सुबह तड़के उठ जाता है और अपने बच्चे में भी इसकी अच्छी आदत डालता है। वह रामायण के जरिए बच्चे को अपनी पुरातन संस्कृति की शिक्षा भी देता है। वह बच्चे को घुमाने भी ले जाता है और उसके साथ खेलता भी है। माँ अपने बच्चे के खान पान और सेहत का विशेष ध्यान रखती है। हर माँ की तरह उसे भी लगता है कि उसके बच्चे ने भर पेट खाया ही नहीं।


माता का अँचल शीर्षक की उपयुक्तता बताते हुए कोई अन्य शीर्षक सुझाइए।

उत्तर: इस कहानी में यह दिखाया गया है कि बच्चा चाहे लाख अपने पिता के पास समय व्यतीत करता हो लेकिन भरपेट खाना तो उसे माँ ही खिला पाती है। बच्चा चाहे अपने पिता के बहुत निकट हो, लेकिन घोर विपत्ति आने पर उसे माँ की गोद में ही सुरक्षा महसूस होती है। इसलिए इस कहानी के लिए ‘माता का अँचल’ शीर्षक उपयुक्त है। मेरी राय में इसका एक और उचित शीर्षक हो सकता है, ‘सुनहरा बचपन’|

बच्चे माता-पिता के प्रति अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक करते हैं?

उत्तर: बच्चे कई तरीके से अपने माता-पिता के प्रति प्रेम व्यक्त करते हैं। कुछ बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान करके ऐसा करते हैं। कुछ बच्चे अपनी माँ से ठिठोली करके ऐसा करते हैं। कुछ शर्मीले बच्चे तो बस मंद मुसकान से ही ऐसा कर देते हैं।

इस पाठ में बच्चों की जो दुनिया रची गई है वह आपके बचपन की दुनिया से किस तरह भिन्न है?

उत्तर: इस पाठ के बच्चों की दुनिया बड़ी मजेदार लगती है। ये बच्चे दीन दुनिया से बेखबर हैं और उन्हें अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं है। इस जमाने में तो बच्चे को स्कूल के पहले दिन से ही अपने क्लास में सबसे आगे रहने की चिंता होने लगती है। आजकल के बच्चों पर स्कूल, परिवार और समाज की ओर से अत्यधिक दवाब बनाया जाता है। हर बच्चे से उम्मीद की जाती है कि वह हरफनमौला बनकर दिखाए। स्कूल की टाइमिंग भी ऐसी है कि बच्चे को तो ठीक से सोने की भी फुरसत नहीं मिल पाती है।