विकास

अलग-अलग व्यक्ति के लिए विकास के मतलब अलग-अलग हो सकते हैं। मान लीजिए कि दो व्यक्ति राम और श्याम हैं। राम को कामकाज के सिलसिले में नियमित रूप से लंबी दूरी की यात्रा करनी पड़ती है, जबकि श्याम अपने गांव में खेती करता है। उनके गांव से होकर एक हाइवे बनता है। इससे राम को बहुत फायदा होता है। लेकिन हाइवे निर्माण के चक्कर में श्याम को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ता है। अब राम के लिये जो विकास हुआ वही श्याम के लिये विनाश साबित हुआ।


विकास की आवश्यकताएँ अलग-अलग लोगों के लिये अलग-अलग हो सकती हैं। यह इस बात पर निर्भर करती है कि वह व्यक्ति विकास के किस चरण में है। मान लीजिए कि हाइवे बनने से पहले राम को बस पकड़ने के लिए अपने गांव से चार किलोमीटर पैदल या साइकिल से जाना पड़ता था। हाइवे बनने के बाद उसके घर से महज दो सौ कदम पर बस स्टॉप बन गया। यह राम के लिए विकास हुआ। राम का एक दोस्त महानगर दिल्ली में रहता है। वह दिल्ली के जिस इलाके में रहता है वहाँ से दफ्तर जाने में उसे दो घंटे से ऊपर लगते हैं और कई सवारियाँ (ऑटोरिक्शा, बस, आदि) बदलनी पड़ती हैं। अगले महीने राम के दोस्त के मोहल्ले के पास से मेट्रो रेल की सेवा शुरु होने वाली है। इससे उस दोस्त के जीवन में विकास होगा।

इन उदाहरणों से पता चलता है कि विकास के कई लक्ष्य होते हैं। नीति निर्धारकों और सरकार को ऐसे लक्ष्य चुनने होते हैं जिससे अधिक से अधिक लोगों को विकास का लाभ मिल सके।

विकास के लक्ष्य:

प्रति व्यक्ति आय: देश की कुल आय को उस देश की जनसंख्या से भाग देने से मिलने वाली राशि को प्रति व्यक्ति आय कहते हैं। सन 2006 की विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 28,000 रु है।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद: किसी देश में उत्पादित होने वाली कुल आय को सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं। इस आँकड़े में हर प्रकार की आर्थिक क्रिया से होने वाली आय को शामिल किया जाता है।

सकल घरेलू उत्पाद: किसी देश में उत्पादित होने वाली कुल आय में से निर्यात से होने वाली आय को घटाने के बाद बचने वाली राशि को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।

शिशु मृत्यु दर: प्रति 1000 जन्म में एक साल से कम आयु में मरने वाले बच्चों की संख्या को शिशु मृत्यु दर कहते हैं। यह दर जितना कम होती है विकास के दृष्टिकोण से उतनी ही बेहतर मानी जाती है। शिशु मृत्यु दर एक महत्वपूर्ण पैमाना है, जिससे किसी भी क्षेत्र में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का पता चलता है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में शिशु मृत्यु दर 30.15 प्रति हजार है। इसका मतलब है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ अच्छी नहीं हैं।


पुरुष और महिला का अनुपात: प्रति एक हजार पुरुषों की तुलना में महिलाओं की जनसंख्या को लिंग अनुपात कहते हैं। सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में प्रति 1000 पुरुषों की तुलना में 940 महिलाएँ हैं। इससे पता चलता है कि भारत में महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है।

जन्म के समय संभावित आयु: एक औसत वयस्क अधिकतम जितनी आयु तक जीता है उसे संभावित आयु कहते हैं। सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में पुरुषों की संभावित आयु 67 साल है, तथा महिलाओं की संभावित आयु 72 साल है। संभावित आयु लंबी होने से यह पता चलता है कि उस क्षेत्र में जीवन का स्तर बेहतर है, मूलभूत सुविधाएँ अच्छी हैं, स्वास्थ्य सुविधाएँ अच्छी हैं और लोगों की आय अच्छी है।

साक्षरता दर: सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर 74% है। एक कुशल मानव संशाधन तैयार करने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। एक बेहतर मानव संसाधन से देश की अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। व्यक्तिगत स्तर पर भी शिक्षा से अनेक नये अवसर खुल जाते हैं। यदि कोई छात्र/छात्रा आईआईटी से इंजीनियर या एम्स से डॉक्टर बन जाता है तो इससे उसका भविष्य तो उज्ज्वल होता ही है उसके परिवार का भविष्य भी उज्ज्वल हो जाता है।

आधारभूत संरचना: किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आधारभूत संरचना रीढ़ की हड्डी का काम करती है। सड़कें, रेल, विमान पत्तन, पत्तन और विद्युत उत्पादन से किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में जान आती है। अच्छी आधारभूत संरचना से आर्थिक क्रियाकलाप बेहतर हो जाते हैं। इससे हर तरफ समृद्धि आती है।


विकास के जरूरी लक्ष्यों का मिश्रण:

ऊपर दी गई लिस्ट को परिपूर्ण नहीं माना जा सकता है लेकिन इस लिस्ट में दिये गये लक्ष्य अन्य लक्ष्यों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं।

राज्यप्रति व्यक्ति आय (2003)शिशु मृत्यु दर (2003)साक्षरता दर (2001)कक्षा 1 से 4 तक निवल उपस्थिति अनुपात (1995 – 96)
पंजाब26000497081
केरल22800119191
बिहार5700604741

इस टेबल के आँकड़े विकास के कुछ रोचक पहलुओं को दिखाते हैं। इनसे विकास के अलग-अलग पहलुओं के बीच के संबंध का भी पता चलता है।



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