क्लास 10 अर्थशास्त्र

वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

वैश्वीकरण

आधुनिक काल में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह आपस में जुड़ी हुई हैं उसे वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन कहते हैं। उदाहरण के लिये माइक्रोसॉफ्ट को लीजिए। माइक्रोसॉफ्ट का हेडक्वार्टर अमेरिका में है। इस कंपनी के सॉफ्टवेअर के कुछ अंश भारत और अन्य कई देशों में बनते हैं। माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेअर पूरी दुनिया में इस्तेमाल किये जाते हैं। अमेरिका का फोर्ड मोटर एक अन्य उदाहरण हो सकता है। फोर्ड की कारें चेन्नई में बनती हैं और चेन्नई में बनी कारें बिक्री के लिये कई देशों तक जाती हैं। इसके अलावा इस कंपनी के गियर बॉक्स किसी अन्य देश में बनते होंगे, सीट बेल्ट किसी और देश में, लाइट, रियर व्यू मिरर किसी अन्य देश में बनते होंगे। कार के लगभग सभी पार्ट अलग अलग वेंडर द्वारा फोर्ड मोटर को सप्लाई किये जाते हैं जिन्हें एक साथ जोड़कर कार बनाई जाती है।

इन सभी क्रियाकलापों से पूरी दुनिया में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। आप भी किसी अन्य उत्पाद या सेवा के बारे में सोच सकते हैं जिसका उत्पादन दुनिया के विभिन्न भागों में होता है। इससे विश्व भर की अर्थव्यवस्थाओं में परस्पर निर्भरता का जन्म होता है।


वैश्वीकरण का विकास

प्राचीन समय से ही विश्व व्यापार ने कई तरीकों से लोगों को जोड़ने का काम किया है। आपने प्राचीन सिल्क रूट का नाम सुना होगा। सिल्क रूट ने एशिया को दुनिया के अन्य भागों से जोड़ने का काम किया था। इस ट्रेड रूट ने न केवल सामान की आवाजाही में मदद की बल्कि लोगों और विचारों को भी एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाया था। यदि भारत से शून्य दुनिया के अन्य भागों तक पहुँचा तो पाश्चात्य पोशाकें भारत में आईं। आज हम जिस तरह से पिज्जा और नूडल खाना पसंद करते हैं उसी तरह विदेशों के लोग चिकन टिक्का और करी खाना पसंद करते हैं।

वैश्वीकरण के शुरुआती दौर में एशिया से कच्चा माल निर्यात होता था और यूरोप से उत्पादों का आयात होता था। लेकिन उन्नीसवीं सदी के मध्य से चीजें बदलने लगीं थीं।

बीसवीं सदी के मध्य से आखिर तक के दौर में कई कंपनियों ने विश्व के विभिन्न भागों में अपने पैर फैला लिये और इस तरह वे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बन गईं।

वैश्वीकरण के कारण:

खर्च कम करने की आवश्यकता: मान लीजिए कि किसी कंपनी को कोई काम करवाना है। उसके लिये पहला विकल्प होगा कि अपने देश में ही काम करवाया जाये जहाँ इसकी लागत अधिक आयेगी। अगला विकल्प होगा कि उस काम को किसी ऐसे देश में करवाया जाये जहाँ इसकी लागत कम आयेगी। यह साफ है कि कोई भी कम्पनी दूसरे विकल्प को चुनेगी। भारत, मलेशिया, चीन और ताइवान में कच्चे माल कम कीमत पर उपलब्ध हैं और इन देशों में मजदूर भी सस्ते में मिल जाते हैं। इससे उत्पादन की लगत कम हो जाती है और कम्पनी को बेहतर मुनाफा होता है। इसलिये जब आप कोई कम्प्यूटर खरीदते हैं तो उसके कुछ पार्ट मलेशिया या ताइवान में बने होते हैं, प्रोसेसर भारत में बना होता है और सॉफ्टवेयर अमेरिका से आता है। अंतिम उत्पाद उस देश में बनता है जहाँ इसे बेचा जाना है।


नये बाजार की तलाश: यदि घरेलू बाजार के ज्यादातर ग्राहकों ने किसी उत्पाद को खरीद लिया है और वहाँ अब न के बराबर खपत होने की संभावना हो तो कम्पनी को अपना बिजनेस बढ़ाने के लिये कोई न कोई योजना बनानी पड़ेगी। किसी नये बाजार में नये ग्राहकों को तैयार करके बिक्री बढ़ाई जा सकती है। आज के दौर में विश्व की कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा चीन और भारत में रहता है। ऐसे में जो भी कम्पनी अधिक बिक्री चाहती है वह इन दो महत्वपूर्ण बाजारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। इसे समझने के लिये किसी गाँव का उदाहरण लेते हैं। यदि किसी गाँव में पैदा हुई सारी सब्जियों को केवल उसी गाँव में बेचना संभव हो तो बहुत ज्यादा ग्राहक नहीं मिलेंगे। ऐसे में सब्जियाँ बहुत सस्ते दर पर बिकेंगी और बरबाद भी होंगीं। अच्छी कीमत के लिये उस गाँव के सब्जी वालों को अधिक ग्राहक की तलाश में शहर की ओर जाने की जरूरत पड़ेगी।

वैश्वीकरण के कारक:

कुछ वर्षों पहले तक ज्यादातर देश स्थानीय उद्योग धंधे को बढ़ावा देने के लिये भारी आयात शुल्क लगाते थे ताकि बाहर का सामान कम से कम आ पाये। वैसी नीतियाँ ट्रेड बैरियर का उदाहरण थीं जिन्हें जानबूझ कर लगाया जाता था। लेकिन वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन ने सभी सदस्य देशों को ट्रेड बैरियर घटाने के लिये सहमत कर लिया। डब्ल्यू टी ओ का मानना है कि पूरी दुनिया में बेरोकटोक आर्थिक अवसर मिलने चाहिये। भारत में 1991 में उदारवादी नीतियों की शुरुआत होने से कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में अपना काम शुरु किया। उसके परिणाम आज सबके सामने हैं। पहले एक कार खरीदने का मतलब होता था एंबेसडर या प्रीमियर पद्मिनी और एक दोपहिया वाहन का मतलब होता था बजाज स्कूटर या राजदूत मोटरसाइकिल। आज लोगों के पास कार या बाइक खरीदने के लिये कई विकल्प हैं।


वैश्वीकरण के परिणाम:

रोजगार के बेहतर अवसर: आज भारत बीपीओ सेक्टर में एक अग्रणी देश है। बीपीओ से कई एमएनसी को बैकऑफिस सपोर्ट मिलता है। अमेरिका में बैठा कोई ग्राहक जब अपनी समस्या के समाधान के लिये फोन कॉल करता है तो शायद वह गुड़गाँव में बैठे किसी व्यक्ति से बात करता है। आर्थिक क्रियाओं के बढ़ने के कारण भारत में कई नये आर्थिक केंद्रों का विकास हुआ है। उदाहरण: गुड़गाँव, चंडीगढ़, बंगलोर, हैदराबाद और मेरठ।

जीवनशैली में बदलाव: लोगों के खान पान का ढ़ंग तेजी से बदला है। आप आज नाश्ते में केल्लॉग के कॉर्न फ्लेक्स खाते होंगे और लंच में आलू टिक्की बर्गर। हो सकता है कि आप लेवाइस की जींस पहनते होंगे। यदि आपके पड़ोस में कोई बीपीओ में काम करने वाला रहता होगा तो आप उसकी अमेरिकन स्टाइल की अंग्रेजी सुनते होंगे।

विकास के असमान लाभ: किसी एमएनसी में काम करने वाले हर एक प्रोफेशनल के मुकाबले सैंकड़ों ऐसे लोग हैं जो रिक्शा चलाते हैं या दिहाड़ी पर काम करते हैं। करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है। हम आज भी महाराष्ट्र या कर्नाटक में किसी किसान की आत्महत्या की खबर सुनते हैं।

विकसित देशों द्वारा गलत तरीकों का इस्तेमाल: विकसित देश आज भी अपने किसानों को भारी अनुदान देते हैं और ट्रेड बैरियर लगाते हैं। बदले में विकासशील देशों को डब्ल्यू टी ओ से बहुत कुछ नहीं मिल पाता है।

सारांश:

वैश्वीकरण एक ऐसी वास्तविकता है जिसे हम नकार नहीं सकते। वैश्वीकरण से नुकसान की तुलना में फायदे अधिक हुए हैं। विश्व के अर्थशास्त्रियों और नीतिनिर्धारकों को अपनी नीतियों में सुधार करने की जरूरत है ताकि वैश्वीकरण के लाभ जनमानस तक पहुँच सकें। जब वैश्वीकरण से विकास के हर पैमाने की प्राप्ति हो जायेगी तभी वैश्वीकरण को सफल माना जायेगा। ये पैमाने न केवल धन कमाने को लेकर हैं, बल्कि सबके लिये अच्छी स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, सुरक्षा और जीवन स्तर के बारे में भी हैं।