वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

वैश्वीकरण: आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था आपस मे जुड़ी हुई है। विश्व के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था के इस परस्पर जुड़ाव को वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन कहते हैं। इसे समझने के लिये नाइकी नामक कंमनी का उदाहरण लेते हैं। यह कम्पनी अपने जूतों के लिये मशहूर है। यह कम्पनी अमेरिका की है लेकिन इस कम्पनी के जूते दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में बनते हैं। नाइकी के जूते लगभग हर देश में बेचे जाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि एक उत्पाद के बनने और ग्राहकों तक पहुँचने के दौरान जितनी आर्थिक क्रियाएँ होती हैं, उनमें से विभिन्न क्रियाएँ दुनिया के विभिन्न देशों में सम्पन्न होती हैं। यह ग्लोबलाइजेशन का एक बेहतरीन नमूना है। इसलिए आज यदि मध्य एशिया में कोई उथलपुथल होती है तो उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।


वैश्वीकरण का विकास

व्यापार ने हमेशा से ही दुनिया के विभिन्न भागों को जोड़ने का काम किया है। आप शायद सिल्क रूट के बारे में जानते होंगे। प्राचीन काल में जिस रास्ते से चीन का रेशम अरब और फिर पश्चिमी देशों में जाता था उस रास्ते को सिल्क रूट कहते हैं। सिल्क रूट से न केवल सामान का आवागमन होता था बल्कि लोगों और विचारों का भी आवगमन होता था। व्यापार के रास्ते ही भारत से शून्य और दशमलव प्रणाली दुनिया के अन्य भागों तक पहुँची थी। अल-जेबरा (बीजगणित) व्यापार के रास्ते ही अरब से दुनिया के बाकी हिस्सों तक पहुँचा। आज हमारे देश के अधिकतर लोगों को इंसटैंट नूडल बहुत पसंद हैं। इनके अलावा हम सेवियाँ, पास्ता, आदि को भी पसंद करते हैं; जो कि नूडल्स के ही अलग-अलग रूप हैं। दरअसल नूडल्स की उत्पत्ति चीन में हुई थी और फिर व्यापार के रास्ते यह दुनिया के अन्य भागों में पहुँचा।

बाजार का वैश्वीकरण तो बहुत पहले से हो रहा था लेकिन औद्योगिक क्रांति ने इसमें तेजी ला दी। उन्नीसवीं सदी में एशिया से कच्चे माल का निर्यात होता था और यूरोप से उत्पादों का आयात होता था। यह स्थिति उन्नीसवीं सदी के मध्य से बदलने लगी थी।

बीसवीं सदी के मध्य के बाद कई कम्पनियों ने विश्व के अलग-अलग हिस्सों में अपने पैर पसारने शुरु किये। इसके साथ ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का जन्म हुआ। जिस कम्पनी का व्यवसाय एक से अधिक देशों में फैला हुआ हो उसे बहुराष्ट्रीय कम्पनी कहते हैं।


वैश्वीकरण के कारण:

खर्च कम करने की आवश्यकता: अधिक से अधिक मुनाफा कमाना हि किसी भी कम्पनी का मुख्य लक्ष्य होता है। इसके लिये उत्पादन की लागत को कम किया जाता है तथा अधिक से अधिक उत्पादों को सही कीमत पर बेचने की कोशिश की जाती है। लागत कम करने के लिये अधिकतर कम्पनियाँ उत्पाद के विभिन्न चरणों को अलग-अलग देशों में पूरा करवाती हैं। अब नाइकी के उदाहरण को लेते हैं। यदि यह कम्पनी जूतों को अमेरिका में बनवाएगी तो इसे अपने श्रमिकों को अधिक मजदूरी देनी पड़ेगी। लेकिन चीन या ताइवान से काम करवाने पर मजदूरी का खर्चा कम हो जायेगा। कच्चा माल ऐसी जगह से लिया जाता है जहाँ वह सबसे सस्ता मिले। यह सब इसलिए किया जाता है ताकि लागत कम हो सके।

नये बाजार की तलाश: किसी भी कम्पनी के उत्पाद के लिये घरेलू बाजार में ग्राहकों की संख्या सीमित होती है। यदि अधिक उत्पाद बेचना है तो उस कम्पनी को नये बाजार तलाशने की जरूरत होगी। मान लीजिए कि एक किसान हिमाचल के एक गांव में सेब की खेती करता है। उसके बागान से जितने सेब निकलते हैं उनकी खपत के लिये उस किसान के गांव में पर्याप्त ग्राहक नहीं हैं। इसलिए किसान को अपने सेब बेचने के लिये किसी अन्य बाजार को तलाशना होगा।

वैश्वीकरण के कारक:

1980 और 1990 के दशक तक दुनिया के अधिकतर देश विश्व बाजार से कटकर रहना पसंद करते थे। वे ऐसा इसलिए करते थे ताकि स्थानीय उद्योग धंधों को फलने फूलने का मौका मिले। बाहरी वस्तुओं के आयात को रोकने के भारी आयात शुल्क लगाया जाता था। ऐसी नीति को ट्रेड बैरियर कहते हैं।

वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेंनाइजेशन ने सदस्य देशों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि ट्रेड बैरियर कम किये जायें। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन हमेशा से पूरी दुनिया में निर्बाध व्यापार का पक्षधर रहा है। भारत भी इस संस्था का एक सदस्य है।

भारत में भी पहले बहुत अधिक ट्रेड बैरियर थे। सरकार ने 1991 में उदारवादी नीतियों की शुरुआत की। उसके बाद भारत में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने कदम रखने शुरु किये। आज उन नीतियों के परिणाम जीवन के हर क्षेत्र में दिखने लगे हैं। पहले भारत में यदि किसी को मोटरसाइकिल खरीदनी होती थी तो दो तीन ब्रांड ही उपलब्ध थे, जैसे कि राजदूत, बुलेट और येजदी। स्कूटर में बजाज का एकाधिकार था। कोई भी वाहन खरीदने के लिये पहले नम्बर लगाना होता था और फिर नम्बर आने में ही दो तीन साल लग जाते थे। आज दोपहिया वाहनों के अनगिनत मॉडल उपलब्ध हैं। आप जब चाहे तब अपना मनपसंद दोपहिया खरीद सकते हैं।


वैश्वीकरण के परिणाम:

रोजगार के बेहतर अवसर: वैश्वीकरण के कारण आर्थिक गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। रोजगार के नये-नये अवसरों का सृजन हुआ है। कई नये आर्थिक केंद्रों का विकास तो वैश्वीकरण के बाद ही हुआ है, जैसे गुड़गांव, चंडीगढ़, पुणे, हैदराबाद, नोएडा, आदि।

जीवनशैली में बदलाव: वैश्वीकरण ने लोगों की जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। 1990 के पहले अधिकतर लोग दो जोड़ी पैंट शर्ट में गुजर बसर कर लेते थे। ज्यादातर स्कूली छात्रों के पास स्कूल ड्रेस के अलावा गिने चुने ही ड्रेस होते थे। आज अधिकतर छात्रों के पास स्कूल के लिए अलग ड्रेस, खेलने के लिए अलग ड्रेस, बाजार जाने के लिए अलग ड्रेस और पार्टी के लिये अलग ड्रेस होते हैं। पहले लोग स्नैक्स के नाम पर तला हुआ पापड़ या घर में बनी आलू की चिप्स खाते थे। अब तो अलग-अलग फ्लेवर के चिप्स पैकेट में मिलते हैं।

विकास के असमान लाभ: वैश्वीकरण ने आर्थिक असमानता को और भी तेजी से बढ़ाया है। एक ओर तो किसी बड़ी कम्पनी का मैनेजर लाखों रुपये का वेतन पाता है, वहीं दूसरी ओर दिहाड़ी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती है। आज भी आबादी के एक बड़े हिस्से के लिये दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो जाता है।

विकसित देशों द्वारा गलत तरीकों का इस्तेमाल: विकसित देश एक तरफ तो ट्रेड बैरियर कम करने की वकालत करते हैं वहीं अपने देश में ट्रेड बैरियर का इस्तेमाल करते हैं। अमेरिका जैसे देश अपने किसानों को भारी अनुदान देते हैं। विकासशील देशों को इससे हानि ही होती है।

सारांश:

वैश्वीकरण सदियों से होता आया है और आगे भी होता रहेगा। यह एक यथार्थ है जिससे हम मुँह नहीं मोड़ सकते। वैश्वीकरण से नुकसान के साथ साथ फायदे भी हुए हैं। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वैश्वीकरण से फायदे अधिक हुए हैं। अब दुनिया के बड़े देशों को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी ताकि वैश्वीकरण का लाभ आम आदमी तक पहुँचे। जब हर वर्ग का आदमी एक सही स्तर की जीवनशैली जीने लगेगा तभी वैश्वीकरण सही मायने में सफल कहलाएगा।



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