क्लास 10 अर्थशास्त्र

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

किसी भी अर्थव्यवस्था को तीन क्षेत्रक या सेक्टर में बाँटा जाता है:

  • प्राथमिक या प्राइमरी सेक्टर
  • द्वितीयक या सेकंडरी सेक्टर
  • तृतीयक या टरशियरी सेक्टर

प्राइमरी सेक्टर: जब आर्थिक क्रियाओं में मुख्य रूप से प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से उत्पादन किया जाता है तो उन क्रियाओं को प्राइमरी सेक्टर के अंदर रखा जाता है। कृषि और कृषि से संबंधित गतिविधियाँ प्राइमरी सेक्टर के अंदर आती हैं।

सेकंडरी सेक्टर: जब प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली के द्वारा अन्य रूपों में बदला जाता है तो उसे सेकंडरी सेक्टर कहते हैं। जिस भी औद्योगिक उत्पादन में भौतिक वस्तुओं का उत्पादन होता है उन्हें सेकंडरी सेक्टर के अंदर रखा जाता है।


टरशियरी सेक्टर: जब आर्थिक क्रियाओं के द्वारा अमूर्त वस्तुएँ; जैसे सेवाएँ; प्रदान की जाती हैं तो उन क्रियाओं को टरशियरी सेक्टर के अंतर्गत रखा जाता है। वित्तीय सेवाएँ, प्रबंधन सलाह, टेलिफोन सेवा, सूचना प्रौद्योगिकी, आदि टरशियरी सेक्टर के उदाहरण हैं।

अर्थव्यवस्था का प्राइमरी सेक्टर से टरशियरी सेक्टर की तरफ का क्रमिक विकास:

पुरानी सभ्यताओं में सारी आर्थिक क्रियाएँ प्राइमरी सेक्टर में होती थीं। जब भोजन का उत्पादन सरप्लस होने लगा तो अन्य उत्पादों की आवश्यकता बढ़ने लगी। इससे सेकंडरी सेक्टर का विकास हुआ। सेकंडरी सेक्टर का विकास उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद फैलने लगा।

सेकंडरी सेक्टर के विकास के बाद एक ऐसे सिस्टम की जरूरत पड़ी जो औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दे। ट्रांसपोर्ट और फिनांस जैसे सेक्टर औद्योगिक गतिविधियों को पालते पोसते हैं। इसी तरह से मुहल्लों में लोगों को चीजें उपलब्ध कराने के लिए अधिक से अधिक दुकानों की जरूरत पड़ने लगी। आखिर में अन्य सेवाएँ; जैसे ट्यूशन, प्रशानिक सेवा; आदि विकसित हुईं।

विभिन्न सेक्टर की पारस्परिक निर्भरता:

इस पारस्परिक निर्भरता को समझने के लिए कोल्ड ड्रिंक उदाहरण लेते हैं। एक कोल्ड ड्रिंक में पानी, चीनी और कृत्रिम फ्लेवर होता है। यदि गन्ने का उत्पादन कम होगा तो कोल्ड ड्रिंक बनाने के लिए चीनी आसानी से नहीं मिलेगी और महंगी मिलेगी। गन्ने को चीनी मिलों तक और चीनी को कोल्ड ड्रिंक की फैक्ट्री तक पहुँचाने के लिए किसी ट्रांसपोर्टर की जरूरत पड़ती है। वस्तुओं के खेतों से फैक्ट्री तक और फैक्ट्री से दुकानों तक आने जाने को सुचारु रूप से संचालित करने के लिये कई लोगों के कुशल सिस्टम की जरूरत पड़ती है। इन सब के लिये मैनेजर और श्रमिकों की आवश्यकता होती है। फिर यदि किसान की बात करें तो फसल उगाने के लिये उसे खाद और बीज की जरूरत पड़ेगी। कोई ऐसा सिस्टम चाहिए जो किसान के घर तक खाद और बीज पहुँचा सके। इस पूरे काम के हर चरण पर पैसे के लेन देन के लिये भी एक कुशल सिस्टम की जरूरत होगी। इस उदाहरण से विभिन्न सेक्टर की पारस्परिक निर्भरता का पता चलता है।


भारत में विभिन्न सेक्टर का विकास और वर्तमान स्थिति

भारतीय अर्थव्यवस्था में अलग अलग सेक्टर का वैल्यू
Fig: भारतीय अर्थव्यवस्था में अलग अलग सेक्टर का वैल्यू

दिये गये ग्राफ को ध्यान से देखिए। इस ग्राफ में 1973 से 2003 तक अलग अलग सेक्टर के वैल्यू को रुपये में दिखाया गया है। दूसरा ग्राफ इन तीस सालों में इन सेक्टर की जीडीपी में भागीदारी को दिखाता है। तीसरा ग्राफ इन तीस सालों में इन सेक्टर द्वारा प्रदान किये गये रोजगार के अवसरों को दिखाता है।

पहले ग्राफ से पता चलता है की इन तीस वर्षों में तीनों सेक्टर में जबरदस्त वृद्धि हुई है। यह हमारी अर्थव्यवस्था के विकास को दिखाता है।

भारत के जीडीपी में अलग अलग सेक्टर का शेअर
Fig: भारत के जीडीपी में अलग अलग सेक्टर का शेअर

दूसरे ग्राफ से यह पता चलता है कि जीडीपी में कृषि का शेअर तेजी से गिरा है, उद्योग का शेअर स्थिर रहा है लेकिन सेवाओं का शेअर तेजी से बढ़ा है। सेवा सेक्टर की वृद्धि 35% से 55% हो गई है जिसे काफी अच्छा माना जा सकता है।

भारत के अलग अलग सेक्टर में रोजगार के अवसर
Fig: भारत के अलग अलग सेक्टर में रोजगार के अवसर

तीसरा ग्राफ एक भयावह स्थिति को दिखाता है। रोजगार के अवसर का जीडीपी में शेअर के साथ कोई तालमेल नहीं है। 1973 में 75% कामगारों को कृषि क्षेत्र में रोजगार मिलता था जो 2000 में घटकर 60% हो गया। लेकिन यदि इसकी तुलना हम कृषि के जीडीपी में शेअर में ह्रास से करें तो पता चलता है अभी भी अधिकांश लोग रोजगार के लिये कृषि पर आश्रित हैं। दूसरे सेक्टर में रोजगार के अवसर उस गति से नहीं बढ़े जिस गति से बढ़ना चाहिए।

ग्राफ में दिये गये आँकड़ों से हम निम्न बातें समझ सकते हैं:

  • अभी भी कामगारों का एक बड़ा हिस्सा कृषि कार्यों में लगा हुआ है। जैसा कि आप जानते हैं कृषि में फसल के मौसम में ही रोजगार मिलता है इसलिये यहाँ पर छिपी हुई बेरोजगारी की संभावना प्रबल होती है। इतिहास पर नजर डालने से पता चलता है कि कोई भी देश प्राइमरी सेक्टर से टरशियरी सेक्टर तक की दूरी तय करने में हर मामले में विकसित हो जाता है। इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि भारत अभी भी काफी पीछे है क्योंकि अभी भी अधिकांश लोग कृषि पर निर्भर हैं।
  • सेकंडरी और टरशियरी सेक्टर रोजगार के अवसर बनाने में विफल रहे हैं जिससे प्राइमरी सेक्टर पर दवाब बढ़ गया है। सेकंडरी और टरशियरी सेक्टर में शिक्षित और कुशल कामगारों को रोजगार तो मिल जाता है लेकिन अशिक्षित और अकुशल कामगारों के लिये रोजगार के अवसरों की भारी कमी है।

अर्थव्यवस्था के अन्य वर्गीकरण

संगठित सेक्टर: जिस सेक्टर में सारी गतिविधियाँ एक सिस्टम से होती हैं और जहाँ कानून का पालन होता है उसे संगठित सेक्टर कहते हैं। इस सेक्टर में श्रमिकों के अधिकारों को पूरी तरजीह दी जाती है और देश तथा उद्योग की परिपाटी के हिसाब से मजदूरी भी मिलती है। संगठित सेक्टर में काम करने वाले श्रमिकों को सरकार की नीतियों के अनुसार सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाती है। संगठित क्षेत्र के श्रमिकों को प्रोविडेंट फंड, लीव एंटाइटलमेंट, मेडिकल बेनिफिट और बीमा जैसी सुविधाएँ भी मिलती हैं।

सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान इसलिए जरूरी है ताकि किसी भी परिवार के कमाने वाले मुखिया की मृत्यु या अक्षम होने की हालत में उसके परिवार को मदद मिल सके और उनका गुजारा हो सके। यदि ऐसा नहीं हुआ तो उस पर आश्रित लोगों का भविष्य अंधेरे में चला जायेगा।

असंगठित सेक्टर: जिस सेक्टर में ज्यादातर कानून की अवहेलना होती है और कोई सिस्टम नहीं होता है उसे असंगठित सेक्टर कहते हैं। छोटे दुकानदार, कुछ छोटे कारखाने वाले अपने मुनाफे पर ज्यादा ध्यान देते हैं और अपने श्रमिकों के मूलभूत अधिकारों की भी अवहेलना करते हैं। श्रमिकों को सही वेतन नहीं मिलता है। उन्हें अन्य सुविधाएँ भी नहीं मिलती हैं; जैसे छुट्टी, हेल्थ बेनिफिट और बीमा।

सार्वजनिक सेक्टर: पब्लिक सेक्टर में वो कम्पनियाँ आती हैं जिन्हें सरकार की ओर से चलाया जाता है। आजादी के बाद भारत बहुत गरीब था। मूलभूत वस्तुओं; जैसे लोहा, इस्पात, अल्मुनियम, खाद और सीमेंट; आदि के कारखाने बनाने के लिये भारी पूँजी की जरूरत थी। इसके अलावा रेल, सड़क, पत्तन, विमान पत्तन, आदि बनाने के लिए भी भारी पूँजी की जरूरत थी। उस जमाने में भारतीय उद्यमियों के पास इतना पैसा नहीं था कि वे इन कामों में पूँजी लगा पाते। इसलिए भारत सरकार ने पब्लिक सेक्टर में बड़े बड़े उपक्रम की रचना की; जैसे स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड, ऑयल ऐंड नैचुरल गैस कमिशन, आदि।

प्राइवेट सेक्टर: जिन कम्पनियों को निजी लोगों द्वारा चलाया जाता है वे प्राइवेट सेक्टर में आती हैं। उदाहरण; टाटा, महिंद्रा, रिलायंस, हीरो मोटर्स, आदि।

बेरोजगारी उन्मूलन के लिये भारत सरकार की योजनाएँ

समाज के पिछड़े वर्ग की मदद के लिये और बेरोजगारी दूर करने के लिये सरकार द्वारा समय समय पर कई योजनाएँ चलाई जाती हैं। नरेगा (नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी‌) को तत्कालीन सरकार द्वारा 2004 में शुरु किया गया था। इसे अब मनरेगा (महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी‌) के नाम से जाना जाता है। इस योजना के तहत हर ग्रामीण घर से कम से कम एक व्यक्ति को साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी जाती है। गाँव में रहने वाले गरीबों को ‘काम का अधिकार’ सुनिश्चित करने के लिए यह एक अनूठा पहल है।