क्लास 10 अर्थशास्त्र

मुद्रा और क्रेडिट

वस्तु विनिमय प्रणाली: मुद्रा का प्रचलन शुरु होने से पहले वस्तु विनिमय प्रणाली का इस्तेमाल होता था। लोग एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन देन करते थे।

आवश्यकताओं का दोहरा संयोग: वस्तु विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कमजोरी है ‘आवश्यकताओ का दोहरा संयोग’। मान लीजिए कि आप अपने स्मार्टफोन के बदले एक गेम कंसोल चाहते हैं। ऐसी स्थिति में आपको किसी ऐसे व्यक्ति को ढ़ूँढ़ना होगा जिसे अपने गेम कंसोल के बदले एक स्मार्टफोन चाहिए। ऐसे दो लोगों को ढ़ूँढ़ना; जो एक दूसरे की चीज की अदल बदल करना चाहते हैं; आसान काम नहीं है।

मुद्रा:

मुद्रा एक माध्यम है जिसके जरिये हम किसी भी चीज को विनिमय द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। सबसे पहले सिक्कों का प्रचलन शुरु हुआ। शुरुआती दौर के सिक्के सोने-चांदी जैसी महँगी धातु से बनाये जाते थे। जब महँगी धातु अत्यधिक महँगी हो गई तो साधारण धातुओं का प्रयोग होने लगा। धीरे-धीरे कागज के नोटों ने सिक्कों की जगह ले ली। ये और बात है कि कम मूल्य वाले सिक्के अभी भी इस्तेमाल किये जाते हैं।

सिक्कों और नोटों को सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसी द्वारा जारी किया जाता है। भारत में इन नोटों को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी किया जाता है। भारत के करेंसी नोट पर आपको एक वाक्य लिखा हुआ मिलेगा जो उस करेंसी नोट के धारक को उस नोट पर लिखी राशि देने का वादा करता है।


मुद्रा के लाभ:

  • यह आवश्यकताओं के दोहरे संयोग से छुटकारा दिलाती है।
  • यह कम जगह लेती है और इसे कहीं भी लाना ले जाना आसान होता है।
  • मुद्रा को आसानी से कहीं भी और कभी भी चलाया जा सकता है।
  • आज के युग में कई ऐसे माध्यम उपलब्ध हैं जिनकी वजह से अब करेंसी नोट को भौतिक रूप में ढ़ोने की जरूरत नहीं है।

मुद्रा के अन्य रूप:

बैंक में निक्षेप या जमा: अपने रोज रोज की जरूरतों के लिये ज्यादातर लोगों को बहुत ही कम करेंसी नोट की आवश्यकता होती है। बाकी राशि लोग सामान्यतया बैंको में निक्षेप या जमा के रूप में रखते हैं। बैंक में रखा हुआ रुपया सुरक्षित रहता है और उसपर ब्याज भी मिलता है। आप अपनी जरूरत के हिसाब से अपने खाते से रुपये निकाल सकते हैं। चूँकि बैंक खाते में जमा रुपये को डिमांड (जरूरत) के हिसाब से निकाला जा सकता है इसलिए इन खातों के निक्षेप (डिपॉजिट) को डिमांड डिपॉजिट कहते हैं।

आप अपना बकाया भुगतान करने के लिये चेक का इस्तेमाल भी करते हैं। चेक पर भुगतान पाने वाले व्यक्ति या संस्था का नाम और भुगतान की जाने वाली राशि लिखी होती है। चेक जारी करने वाले आदमी को चेक के नीचे दस्तखत करने होते हैं। इसके अलावा आप किसी भुगतान के लिए डिमांड ड्राफ्ट भी खरीद सकते हैं। दिखने में यह चेक की तरह ही होता है लेकिन इसपर बैंक के अधिकारी के दस्तखत होते हैं।

क्रेडिट: बैंक में जमा राशि का एक छोटा सा हिस्सा ही कैश के रूप में बैंक के पास रहता है। यह सामान्यतया कुल जमा राशि का 15% होता है। यह राशि इसलिये रखी जाती है ताकि जब कोई भी खाताधारी अपना पैसा निकालने आये तो उसे भुगतान किया जा सके। यह राशि काफी होती है क्योंकि खाताधारकों की कुल संख्या का एक बहुत छोटा प्रतिशत ही किसी एक दिन को पैसे निकालने आता है। बाकी कि राशि का इस्तेमाल उन लोगों को कर्ज देने में किया जाता है जो कर्ज लेने आते हैं। कर्ज में दी गई राशि को क्रेडिट कहा जाता है। बैंक क्रेडिट पर दी गई राशि पर ब्याज लेता है। बैंक द्वारा चार्ज किया गया ब्याज दर हमेशा बैंक द्वारा दिये गये ब्याज दर से ज्यादा होता है। इस तरह से बैंक की आय का मुख्य स्रोत ब्याज होता है।

क्रेडिट/डेबिट कार्ड: आजकल क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड का प्रचलन है। एक डेबिट कार्ड के द्वारा आप अपने खाते में जमा राशि में से कोई भी पेमेंट कर सकते हैं। लेकिन एक क्रेडिट कार्ड से आपको क्रेडिट (यानि लोन) पर रुपये मिलते हैं। क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड से भुगतान इलेक्ट्रॉनिक रूप में होता है इसलिए कैश ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।


क्रेडिट की शर्तें:

लोगों को अक्सर कुछ जरूरतों के लिये कर्ज लेने की जरूरत पड़ती है। कई व्यवसाइयों को कच्चा माल और मशीन खरीदने के लिये कर्ज लेना पड़ता है। कई किसानों को बीज, खाद, कृषि औजार, आदि खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। लोग अक्सर गाड़ी और घर खरीदने के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं। इस तरह से अर्थव्यवस्था में क्रेडिट की अहम भूमिका होती है।

हर लोन एग्रीमेंट में ब्याज दर और लोन चुकता करने के बारे में सारे नियम व शर्तें लिखी होती हैं। लोन चुकता करने के लिये अक्सर बैंक एक मासिक किस्त तय करता है।

कोलैटेरल या समर्थक ऋणाधार: उधार लेने वाले को किसी चल या अचल सम्पत्ति को कर्ज लेने के लिये गिरवी रखनी होती है। इसे कोलैटरल कहते हैं। उदाहरण: जमीन, घर, गाड़ी, मवेशी, बैंक में जमा राशि, बीमा पॉलिसी, सोना, आदि। यदि उधार लेने वाला व्यक्ति लोन चुकता करने में अक्षम हो जाता है तो उधार देने वाले को यह अधिकार होता है कि कोलैटरल को बेच कर कर्ज की राशि की उगाही करे।

कर्ज की शर्तें: कर्ज की शर्तों में ब्याज दर, कोलैटरल और भुगतान की विधि का वर्णन हो सकता है। कर्ज की शर्तें अलग अलग लोन एग्रीमेंट में अलग अलग होती हैं और यह कर्ज लेने वाले और कर्ज देने वाले की हैसियत पर भी निर्भर करता है।


कर्ज के स्रोत

  • औपचारिक सेक्टर: इस सेक्टर में बैंक और को-ऑपरेटिव सोसाइटी आती है।
  • अनौपचारिक सेक्टर: इस सेक्टर में साहुकार, दोस्त, रिश्तेदार, व्यापारी और जमींदार आते हैं।

नीचे दिये गये चित्र में ग्रामीण इलाकों में 2003 में लोन के विभिन्न स्रोतों को दिखाया गया है।

ग्रामीण इलाकों में कर्ज के स्रोत 2003
Fig: ग्रामीण इलाकों में कर्ज के स्रोत 2003

औपचारिक सेक्टर को रिजर्व बैंक द्वारा जारी नियमों और कानूनों का पालन करना पड़ता है लेकिन अनौपचारिक सेक्टर पर यह बात लागू नहीं होती है। अनौपचारिक सेक्टर के कर्जदाता सामान्यतया ब्याज की उँची दर चार्ज करते हैं। ब्याज दर के ऊँची होने की वजह से कर्ज लेने वाले को बहुत परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में कर्ज लेने वाला अक्सर कर्ज के जाल में फँस जाता है। कर्ज लेने वाला कभी भी कर्ज के कुचक्र से नहीं निकल पाता है।

ज्यादातर गरीब लोग बैंक और को-ऑपरेटिव सोसाइटी की कर्ज की पात्रता को पूरा नहीं कर पाते हैं। कई अन्य लोगों के पास जरूरी कागजात नहीं होते हैं; जैसे की आवास प्रमाण पत्र या आय प्रमाण पत्र। ऐसे लोगों को अनौपचारिक सेक्टर के ऋणदाताओं का ही आसरा रहता है।

सेल्फ हेल्प ग्रुप:

सेल्फ हेल्प ग्रुप एक नई परिघटना है। किसी भी सेल्फ हेल्प ग्रुप में मुट्ठी भर लोग होते हैं; जैसे 15 से 20 सदस्य। सभी मेम्बर अपने जमा किये हुए पैसे को इकट्ठा करते हैं। उस जमा राशि में से किसी भी सदस्य को छोटा कर्जा दिया जाता है। फिर यह ग्रुप उस कर्जे पर ब्याज लेता है। इस प्रकार के सिस्टम को माइक्रोफिनांस कहते हैं क्योंकि इसमें कर्जे की राशि कम होती है।

सबसे पहले बंगलादेश के ग्रामीण बैंक ने माइक्रोफिनांस की परिपाटी शुरु की। ग्रामीण बैंक के संस्थापक मुहम्मद यूनुस को गरीबों के उत्थान के प्रयासों के लिये 2006 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

सेल्फ हेल्प ग्रुप ने ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक कर्ज दाताओं के प्रकोप को काफी हद तक कम किया है। आज भारत में कई बड़ी कंपनियाँ सेल्फ हेल्प ग्रुप को प्रश्रय दे रही हैं।