क्लास 10 भूगोल

विनिर्माण उद्योग

विनिर्माण: कच्चे माल को मूल्यवान उत्पाद में बनाकर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहते हैं।

विनिर्माण का महत्व

विनिर्माण उद्योग से कृषि को आधुनिक बनाने में मदद मिलती है और कृषि ही हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसके अलावा विनिर्माण से लोगों की आय के लिए कृषि पर से निर्भरता कम होती है। ऐसा इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि विनिर्माण के कारण प्राइमरी और सेकंडरी सेक्टर में रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं।

उद्योगों के विकास से बेरोजगारी और गरीबी हटाने में मदद मिलती है।

उत्पादित वस्तुओं के निर्यात से व्यापार बढ़ता है और इससे विदेशी मुद्रा देश में आती है।

जिस देश में बड़े पैमाने पर विनिर्माण होता है वह देश संपन्न हो जाता है।


राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विनिर्माण उद्योग का योगदान

पिछले दो दशकों से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विनिर्माण का शेअर 17% पर ही स्थिर रहा है। सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग का कुल शेअर 27% है जिसमें से 10% खनन, बिजली और गैस से आता है।

पिछले दशक में विनिर्माण की वृद्धि दर 7% रही है। 2003 से यह वृद्धि दर 9 से 10% रही है। अगले दशक के लिये कम से कम 12% की वृद्धि दर की आवश्यकता है।

भारत में सरकार की ओर से सही नीतियाँ बनाने और उद्योग की ओर से सही कार्य करने के लिए नेशनल मैन्युफैक्चरिंग काउंसिल (NMCC) का गठन किया गया है।

उद्योग अवस्थिति

उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कुछ कारक निम्नलिखित हैं:

  • कच्चे माल की उपलब्धता
  • श्रम की उपलब्धता
  • पूंजी की उपलब्धता
  • ऊर्जा की उपलब्धता
  • बाजार की उपलब्धता
  • आधारभूत ढ़ाँचे की उपलब्धता

कुछ उद्योग शहर के निकट स्थित होते हैं। शहर के पास होने के कारण बाजार उपलब्ध हो जाता है। इसके अलावा शहर से कई सेवाएँ भी मिल जाती हैं; जैसे कि बैंकिंग, बीमा, यातायात, श्रमिक, विशेषज्ञ सलाह, आदि। कई उद्योगों को शहर के समीप होने का बहुत फायदा मिलता है। ऐसे औद्योगिक केंद्रों को एग्लोमेरेशन इकॉनोमी कहते हैं।

आजादी के पहले के समय में ज्यादातर औद्योगिक इकाइयाँ बंदरगाहों के निकट होती थीं; जैसे कि मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, आदि। इसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों का विकास ऐसे औद्योगिक शहरी क्षेत्रों के रूप में हुआ जिनके चारों ओर ग्रामीण कृषि पृष्ठप्रदेश थे।


उद्योग के प्रकार:

कच्चे माल के आधार पर वर्गीकरण:

  • कृषि आधारित उद्योग: कपास, ऊन, जूट, सिल्क, रबर, चीनी, चाय, कॉफी, आदि।
  • खनिज आधारित उद्योग: लोहा इस्पात, सीमेंट, अलमुनियम, पेट्रोकेमिकल्स, आदि।

भूमिका के आधार पर वर्गीकरण:

  • आधारभूत उद्योग: ये उद्योग दूसरे उद्योगों को कच्चे माल और अन्य सामान की आपूर्ति करते हैं। उदाहरण: लोहा इस्पात, तांबा प्रगलन, अलमुनियम प्रगलन, आदि।
  • उपभोक्ता उद्योग: ये उद्योग सीधा ग्राहक को सामान सप्लाई करते हैं। उदाहरण: चीनी, कागज, इलेक्ट्रॉनिक्स, साबुन, आदि।

पूंजी निवेश के आधार पर:

  • लघु उद्योग: यदि उद्योग में एक करोड़ रुपए तक की पूंजी का निवेश हो तो उसे लघु उद्योग कहते हैं।
  • बृहत उद्योग: यदि उद्योग में एक करोड़ रुपए से अधिक की पूंजी का निवेश हो तो उसे बृहत उद्योग कहते हैं।

स्वामित्व के आधार पर:

  • सार्वजनिक या पब्लिक सेक्टर: सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रबंधित उद्योग को पब्लिक सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: SAIL, BHEL, ONGC, आदि।
  • प्राइवेट सेक्टर: किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित उद्योग को प्राइवेट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: टिस्को, रिलायंस, महिंद्रा, आदि।
  • ज्वाइंट सेक्टर: सरकार और व्यक्तियों द्वारा साझा रूप से प्रबंधित उद्योग को ज्वाइंट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: ऑयल इंडिया लिमिटेड।
  • को-ऑपरेटिव सेक्टर: ऐसे उद्योगों का प्रबंधन कच्चे माल के निर्माता या सप्लायर या कामगार या दोनों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार के उद्योग में संयुक्त रूप से संसाधनों को इकट्ठा किया जाता है और लाभ या हानि को अनुपातिक रूप से वितरित किया जाता है। मशहूर दूध को‌-ऑपरेटिव अमूल इसका बेहतरीन उदाहरण है। महाराष्ट्र का चीनी उद्योग इसका एक और उदाहरण है।

कच्चे और तैयार माल की मात्रा और भार के आधार पर:

  • भारी उद्योग: लोहा इस्पात
  • हल्के उद्योग: इलेक्ट्रॉनिक्स