विनिर्माण उद्योग

विनिर्माण: कच्चे माल को मूल्यवान उत्पाद में बनाकर अधिक मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करने की प्रक्रिया को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहते हैं।

विनिर्माण का महत्व


राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विनिर्माण उद्योग का योगदान

उद्योग अवस्थिति

उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कुछ कारक नीचे दिये गये हैं:

कुछ उद्योग को शहर के निकट होने से कई लाभ मिलते हैं। शहर के पास होने के कारण बाजार उपलब्ध हो जाता है। शहर से कई सेवाएँ भी मिल जाती हैं; जैसे कि बैंकिंग, बीमा, यातायात, श्रमिक, विशेषज्ञ सलाह, आदि। ऐसे औद्योगिक केंद्रों को एग्लोमेरेशन इकॉनोमी कहते हैं।

आजादी के पहले के दौर में ज्यादातर औद्योगिक इकाइयाँ बंदरगाहों के निकट होती थीं; जैसे कि मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, आदि। इसके परिणामस्वरूप ये क्षेत्र ऐसे औद्योगिक शहरी क्षेत्रों के रूप में विकसित हुए जिनके चारों ओर ग्रामीण कृषि पृष्ठप्रदेश थे।


उद्योग के प्रकार:

कच्चे माल के आधार पर वर्गीकरण:

  1. कृषि आधारित उद्योग: कपास, ऊन, जूट, सिल्क, रबर, चीनी, चाय, कॉफी, आदि।
  2. खनिज आधारित उद्योग: लोहा इस्पात, सीमेंट, अलमुनियम, पेट्रोकेमिकल्स, आदि।

भूमिका के आधार पर वर्गीकरण:

  1. आधारभूत उद्योग: जिस उद्योग द्वारा अन्य उद्योगों को कच्चे माल और अन्य सामान की आपूर्ति होती है उन्हें आधारभूत उद्योग कहते हैं। उदाहरण: लोहा इस्पात, तांबा प्रगलन, अलमुनियम प्रगलन, आदि।
  2. उपभोक्ता उद्योग: जिस उद्योग से सीधा ग्राहक को वस्तुएँ मिलती हैं उसे उपभोक्ता उद्योग कहते हैं। उदाहरण: चीनी, कागज, इलेक्ट्रॉनिक्स, साबुन, आदि।

पूंजी निवेश के आधार पर:

  1. लघु उद्योग: एक करोड़ रुपए तक की पूंजी निवेश वाले उद्योग को लघु उद्योग कहते हैं।
  2. बृहत उद्योग: एक करोड़ रुपए से अधिक की पूंजी निवेश वाले उद्योग को बृहत उद्योग कहते हैं।

स्वामित्व के आधार पर:

  1. सार्वजनिक या पब्लिक सेक्टर: सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रबंधित होने वाले उद्योग को पब्लिक सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: SAIL, BHEL, ONGC, आदि।
  2. प्राइवेट सेक्टर: किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित उद्योग को प्राइवेट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: टिस्को, रिलायंस, महिंद्रा, आदि।
  3. ज्वाइंट सेक्टर: सरकार और व्यक्तियों द्वारा साझा रूप से प्रबंधित उद्योग को ज्वाइंट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: ऑयल इंडिया लिमिटेड।
  4. को-ऑपरेटिव सेक्टर: जिस उद्योग का प्रबंधन कच्चे माल के निर्माता या सप्लायर या कामगार या दोनों द्वारा किया जाता है उसे को-ऑपरेटिव सेक्टर कहते हैं। को-ऑपरेटिव में संसाधनों को संयुक्त रूप से इकट्ठा किया जाता। इस सेक्टर में लाभ या हानि को अनुपातिक रूप से वितरित किया जाता है। उदाहरण: अमूल, लिज्जत पापड़, चीनी उद्योग, आदि।

कच्चे और तैयार माल की मात्रा और भार के आधार पर:

  1. भारी उद्योग: लोहा इस्पात
  2. हल्के उद्योग: इलेक्ट्रॉनिक्स


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