औद्योगीकरण का युग

आदि औद्योगीकरण

प्रारंभिक फैक्ट्रियों के शुरु होने के समय से ही लोग औद्योगीकरण की शुरुआत मानते हैं। लेकिन औद्योगीकरण की शुरुआत से ठीक पहले भी इंग्लैंड में अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिये बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। बड़े पैमाने पर उत्पादन के उस काल को आदि-औद्योगीकरण का काल कहते हैं।

उस जमाने में शहरों में दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड बहुत शक्तिशाली होते थे। इसलिए नये व्यापारियों को शहर में काम करने का मौका नहीं मिल पाता था। ऐसे व्यापारी गांवों के लोगों से उत्पादन करवाते थे और फिर उत्पाद को उपभोक्ताओं तक पहुँचाते थे। उसी दौरान खुले खेत खत्म हो रहे थे और कॉमंस की बा‌ड़ाबंदी की जा रही थी। किसानों के पास इतनी उपज नहीं थी कि परिवार का पेट भर सकें। इसलिए किसान आसानी से नये व्यापारियों के लिए काम करने को राजी हो गये। वे काम करने के साथ अपने खेत और अपने परिवार पर भी ध्यान दे पाते थे।


कारखानों की शुरुआत

इंगलैंड में कारखाने सबसे पहले 1730 के दशक में बनने शुरु हुए, और अठारहवीं सदी के अंत तक पूरे इंगलैड में जगह जगह कारखाने दिखने लगे। उत्पादन का स्तर किस कदर बढ़ा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कपास का आयात 1760 में 25 पाउंड से बढ़कर 1787 में 229 लाख पाउंड हो गया।

कारखानों से लाभ: फैक्ट्रियों के खुलने से कई फायदे हुए। इससे उत्पादन के हर चरण की कुशलता बढ़ गई। नई मशीनों की मदद से प्रति श्रमिक उत्पादन की मात्रा अधिक हो गई और उत्पाद की गुणवत्ता भी बढ़ गई। सबसे पहले औद्योगीकरण का असर मुख्य रूप से कपड़ा उद्योग में हुआ। फैक्ट्री की चारदीवारी के भीतर मजदूरों की निगरानी करना और उनसे काम लेना आसान हो गया।


औद्योगिक परिवर्तन की गति


श्रमिकों का जीवन

काम की तलाश में गांव के लोग भारी संख्या में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। यदि किसी का कोई दोस्त या रिश्तेदार पहले से शहर में रहता था तो उसे काम मिलने में आसानी होती थी। कई लोगों को महीनों तक नौकरी मिलने का इंतजार करना पड़ता था। पैसे की कमी के कारण इन लोगों को पुलों या रैन बसेरों में रात बितानी पड़ती थी। कुछ निजी स्वामियों ने भी रैन बसेरे बनवाए थे। गरीबों के लिए पूअर लॉ अथीरिटी बनी थी जो बेघर लोगों के लिए कैजुअल वार्ड की व्यवस्था करती थी।

कई उद्योगों में श्रमिकों की मांग मौसमी होती थी। व्यस्त महीने बीत जाने के बाद श्रमिक सड़क पर आ जाते थे। कुछ अपने गांव लौट जाते थे लेकिन कुछ काम मिलने की उम्मीद में शहर में ही रुक जाते थे।


उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में वेतन में थोड़ा सा इजाफा हुआ था। लेकिन वेतन के बढ़ने की दर महंगाई दर से कम थी, इसलिए मजदूरों के जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं हो पाया। इसके अलावा नियोजन की अवधि की समस्या भी बरकरार थी। अधिकतर मजदूरों को साल के कुछ ही महीने काम मिल पाता था। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अर्थव्यवस्था के अच्छे दौर में भी शहरों की जनसंख्या का लगभग 10% अत्यधिक गरीबी में रहता था। आर्थिक मंदी के समय बेरोजगारी दर 35 से 75% के बीच हो जाती थी।

श्रमिक अक्सर बेरोजगारी के डर से नई तकनीक का घोर विरोध करते थे। जब स्पिनिंग जेनी नाम की मशीन आई तो महिलाओं ने इन मशीनों को तोड़ना शुरु कर दिया, क्योंकि उन्हें अपना रोजगार छिन जाने का डर था।

1840 के दशक के बाद शहरों में भवन निर्माण में तेजी आने के कारण रोजगार के नये अवसर पैदा हुए। 1840 में परिवहन उद्योग में श्रमिकों की संख्या दोगुनी हो गई जो आने वाले तीस वर्षों में फिर से दोगुनी हो गई।



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