मेंढक और नाग

एक कुँए में मेढकों का राजा अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ रहता था। लेकिन कुछ रिश्तेदार हमेशा मेंढक राजा को धोखा दिया करते थे। मेंढक राजा ऐसे रिश्तेदारों से तंग आ चुका था और इनसे छुटकारा पाना चाहता था। एक दिन जब वह कुँए की मुंडेर पर बैठा था तो अचानक उसके सामने एक भयंकर नाग आ गया। नाग बहुत भूखा था और मेंढक राजा को खाना चाहता था। लेकिन मेंढक राजा ने नाग से एक सौदा किया और उसे कुँए में रहने का निमंत्रण दे दिया। मेंढक राजा ने सोचा कि तंग करने वाले रिश्तेदारों से छुटकारा पाने का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता।

नाग की तो जैसे पाँचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में। मेंढक राजा ने नाग को दिखा दिया कि कौन कौन उसके दुश्मन थे और ऐसा मान लिया कि नाग सिर्फ उन्हें ही खाएगा। कुछ महीने बीतने के बाद नाग ने सभी दुश्मन मेंढकों को साफ़ कर दिया। लेकिन नाग अब उस कुँए को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला था और बाकी बचे हुए मेंढकों को भी चट करना चाहता था। अब तो मेंढक राजा अपने ही जाल में फँस चुका था। नाग के कोप से बचने के लिए अब प्रतिदिन मेंढक राजा अपने एक-एक रिश्तेदार को बारी-बारी से उसके पास भेजने लगा। आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया जब मेंढक राजा को अपने बेटे को भी नाग के पास भेजना पड़ा। इसके बाद कुँए में वही एक अकेला मेंढक बच गया।

cobra and frog in well

जब नाग उसे खाने आया तो उसने कहा कुँए में बचे आखिरी मेंढक को खाने से कोई लाभ नहीं होगा। उसने कहा कि वह एक दूसरे कुँए से जाकर और मेंढकों को बुला लायेगा ताकि नाग को भरपूर भोजन मिल सके। नाग मेंढक की बातों में आ गया। इस तरह से मेंढक को वहाँ से अपनी जान बचाकर भागने का मौक़ा मिल गया।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ऐसा जरूरी नहीं कि आपके दुश्मन का दुश्मन आपका दोस्त ही हो।



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